रिपोर्ट- योगानंद श्रीवास्तव
बोकारो: जिले के कसमार प्रखंड स्थित दुर्गापुर गांव में होली का नाम सुनते ही लोग घबरा जाते हैं, क्योंकि इस गांव में पिछले 300 वर्षों से होली नहीं खेली जाती।
क्या है होली न खेलने का कारण?
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, होली के दिन ही इलाके के राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या रामगढ़ के राजा द्वारा कर दी गई थी। इसके बाद गांव में कभी भी होली नहीं मनाई गई।
करीब 100 साल बाद, जब कुछ मल्हार जाति के खानाबदोश लोग गांव में आकर ठहरे थे, उन्होंने होली खेली। उसी दिन गांव में दो लोगों की मृत्यु हो गई और महामारी फैल गई। जब गांव के लोगों ने पाहन (गांव के पुजारी) से संपर्क किया, तो उन्होंने बताया कि यह सब होली खेलने के कारण हुआ।
इसके बाद गांव के लोग बाबा बड़राव के पास पहुंचे, पूजा-अर्चना की और क्षमा मांगी। तब जाकर गांव में शांति स्थापित हुई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि गांव में कोई भी व्यक्ति होली नहीं खेलता।
गांव में होली खेलने पर रोक, लेकिन अन्य स्थानों पर अनुमति
गांव के लोगों का कहना है कि बाबा बड़राव को रंग पसंद नहीं है, इसलिए गांव में होली नहीं खेली जाती। अगर कोई व्यक्ति ससुराल या मामा के घर जाता है, तो वहां होली खेल सकता है, लेकिन गांव में इसकी मनाही है।
अगर गांव का कोई व्यक्ति होली के दिन दूसरे गांव जाता है, तो वहां के लोग भी उसे रंग लगाने से डरते हैं। गांव में कुल 11 टोले हैं और 5,000 से अधिक की आबादी है। यहां शादी करके आने वाली महिलाएं भी गांव की इस परंपरा को मानती हैं।
राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या से जुड़ी कहानी
गांव वालों के अनुसार, रामगढ़ के राजा पद्म की पत्नी अपने मायके बंगाल से होली के दो दिन पहले इसी रास्ते से गुजर रही थीं। राजा दुर्गा प्रसाद ने रानी को रोककर उनके सामानों की तलाशी ली, जिसमें नई साड़ियां भी शामिल थीं। यह बात रानी ने जाकर राजा पद्म को बताई।
इसके बाद होली के दिन रामगढ़ के राजा अपने सैनिकों के साथ दुर्गापुर पहुंचे और राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या कर दी। तभी से गांव में होली खेलने की परंपरा समाप्त हो गई।
क्या करते हैं गांव के लोग होली के दिन?
गांव में होली पर रंग-गुलाल नहीं खेला जाता, लेकिन त्योहार की मिठास बनाए रखने के लिए पुआ-पकवान जरूर बनाए और खाए जाते हैं। गांव के लोग आज भी इस परंपरा का पालन कर रहे हैं और कोई भी होली खेलने की हिम्मत नहीं करता।
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