मोदी सरकार का मुकेश अंबानी पर 24,500 करोड़ का दबाव: कॉर्पोरेट और राजनीति का टकराव

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मोदी सरकार का मुकेश अंबानी पर 24,500 करोड़ का दबाव: कॉर्पोरेट और राजनीति का टकराव

रिलायंस-ओएनजीसी विवाद का परिचय

मोदी सरकार ने भारत के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) से 2.81 अरब डॉलर (लगभग 24,500 करोड़ रुपये) की मांग की है। यह मांग पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा की गई है और यह दिल्ली उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के हालिया फैसले के बाद सामने आई है। यह विवाद राज्य के स्वामित्व वाली तेल कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) के ब्लॉकों से प्राकृतिक गैस के कथित स्थानांतरण से जुड़ा है। RIL के साथ-साथ इसके कंसोर्टियम पार्टनर BP एक्सप्लोरेशन और NIKO (NECO) लिमिटेड को भी यह नोटिस भेजा गया है।

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रिलायंस इंडस्ट्रीज ने एक एक्सचेंज फाइलिंग में बताया कि उसे सरकार से 3 मार्च, 2025 को मांग पत्र प्राप्त हुआ था। यह मामला 4 मार्च, 2025 को सुर्खियों में आया, जब इसकी जानकारी सार्वजनिक हुई।


विवाद की उत्पत्ति और ओएनजीसी का दावा

यह विवाद 2013 में शुरू हुआ, जब ओएनजीसी ने दावा किया कि रिलायंस के कंसोर्टियम ने कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में अपने सटे हुए गैस ब्लॉक KG-D6 से अवैध रूप से लाभ उठाया था। ओएनजीसी का कहना था कि रिलायंस ने उसके ब्लॉकों से प्राकृतिक गैस का रिसाव कर उसका उपयोग किया, जिसके चलते सरकार ने शुरू में कंसोर्टियम से 1.529 अरब डॉलर और ब्याज की मांग की थी। इस राशि को बाद में बढ़ाकर 2.81 अरब डॉलर कर दिया गया।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा कि रिलायंस और उसके साझेदारों ने 31 मार्च, 2016 तक सात वर्षों में 338.332 मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट गैस का उत्पादन किया, जो ओएनजीसी के ब्लॉकों से KG-D6 में बंगाल की खाड़ी में रिस गई थी। इस गैस के उत्पादन से प्राप्त लाभ को सरकार ने “डिस्गोर्जमेंट” के रूप में मांगने का फैसला किया।


मांग की गणना और अतिरिक्त दबाव

सरकार ने अपनी मांग की गणना इस प्रकार की:

  • मूल मांग: 1.47 अरब डॉलर
  • उत्पादित गैस पर भुगतान की गई रॉयल्टी (71.71 मिलियन डॉलर) को घटाने के बाद
  • LIBOR प्लस 2% की दर से ब्याज (149.86 मिलियन डॉलर) जोड़ने के बाद
  • कुल मांग: 1.55 अरब डॉलर

इसके अलावा, सरकार ने रिलायंस से 174.9 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त लाभ पेट्रोलियम भुगतान करने का दबाव डाला, क्योंकि KG-D6 का उत्पादन लक्ष्य से कम रहा, जिसके कारण कुछ लागतों को अस्वीकार कर दिया गया था। इस बढ़ी हुई मांग को मिलाकर कुल राशि 2.81 अरब डॉलर (लगभग 24,500 करोड़ रुपये) तक पहुंच गई।


कानूनी लड़ाई और मध्यस्थता

रिलायंस और उसके साझेदारों ने 11 नवंबर, 2016 को इस मांग के खिलाफ मध्यस्थता नोटिस दायर किया था। जुलाई 2018 में, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने सरकार के दावे को खारिज कर दिया और 2-1 के बहुमत से तीनों साझेदारों को 8.3 मिलियन डॉलर का मुआवजा देने का फैसला सुनाया।

हालांकि, सरकार ने इस मध्यस्थता पुरस्कार को दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठ के समक्ष चुनौती दी। सरकार का तर्क था कि यह पुरस्कार “सार्वजनिक नीति के खिलाफ” है और रिलायंस को “गंभीर धोखाधड़ी” के लिए लाभ देता है। मई 2023 में, एकल पीठ ने मध्यस्थता पुरस्कार को बरकरार रखते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण “संभावित” है और इसमें हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।


डिवीजन बेंच का फैसला और वर्तमान स्थिति

सरकार ने एकल पीठ के फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच में अपील की। 15 फरवरी, 2025 को डिवीजन बेंच ने मई 2023 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसके बाद मंत्रालय ने 2.81 अरब डॉलर की मांग को औपचारिक रूप से लागू किया। रिलायंस ने इस मांग को “कानूनी रूप से असंगत” करार दिया और 4 मार्च, 2025 को अपनी एक्सचेंज फाइलिंग में कहा कि वह इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी। कंपनी का मानना है कि इस मामले में उस पर कोई दायित्व नहीं बनता।


शेयर बाजार पर प्रभाव

इस खबर के सार्वजनिक होने के बाद रिलायंस के शेयरों में गिरावट देखी गई। 4 मार्च, 2025 को सुबह 11:00 बजे तक शेयर 1,172 रुपये प्रति शेयर पर सपाट चल रहे थे, जो निवेशकों के बीच अनिश्चितता को दर्शाता है।


निष्कर्ष

रिलायंस-ओएनजीसी विवाद एक जटिल कानूनी और वित्तीय मामला है, जो प्राकृतिक गैस के उत्पादन और लाभ के अधिकारों से जुड़ा है। मोदी सरकार की 24,500 करोड़ रुपये की मांग ने मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं। रिलायंस इस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी कर रही है, जिससे इस विवाद का भविष्य अभी अनिश्चित बना हुआ है।

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