BY: Yoganand Shrivastva
Saudi Arabia Israel Houthi Conflict इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान में शामिल होने के लिए सऊदी अरब से संपर्क साधा था। हालांकि, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। माना जा रहा है कि क्षेत्रीय तनाव बढ़ने और सऊदी जनता में नाराजगी पैदा होने की आशंका इस फैसले की प्रमुख वजहों में शामिल थी।
सऊदी अरब ने क्यों ठुकराया इजरायल का प्रस्ताव?
Saudi Arabia Israel Houthi Conflict इजरायली समाचार पत्र हारेत्ज के हवाले से आई रिपोर्टों के अनुसार, नेतन्याहू ने अमेरिकी मध्यस्थता के जरिए सऊदी अरब से संपर्क किया था। उनका उद्देश्य यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान में इजरायल की भागीदारी का रास्ता तलाशना था।
रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी नेतृत्व को आशंका थी कि इजरायल के साथ सीधे सैन्य सहयोग से देश के भीतर नाराजगी बढ़ सकती है। इसी वजह से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कथित तौर पर इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। हालांकि, सऊदी अधिकारियों की ओर से इस मामले पर आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
नेतन्याहू की नजर सऊदी अरब से संबंध सामान्य करने पर
Saudi Arabia Israel Houthi Conflict इजरायल और सऊदी अरब के बीच फिलहाल औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। नेतन्याहू लंबे समय से दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य करने की कोशिश करते रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल को उम्मीद थी कि सैन्य सहयोग से दोनों देशों के बीच भरोसा बढ़ेगा और भविष्य में राजनयिक समझौते का रास्ता खुल सकता है।
लेकिन सऊदी अरब ने फिलिस्तीनी मुद्दे को संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया से जोड़ रखा है। रियाद का रुख रहा है कि फिलिस्तीनी समस्या का स्थायी समाधान और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण शर्तें हैं। दूसरी ओर, नेतन्याहू फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के प्रस्ताव का विरोध करते रहे हैं। यही मतभेद दोनों देशों के बीच समझौते की राह में बड़ी बाधा बना हुआ है।
हूती हमलों से क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका
Saudi Arabia Israel Houthi Conflict यमन में सक्रिय हूती विद्रोही लंबे समय से क्षेत्र में सैन्य और समुद्री गतिविधियों को प्रभावित करते रहे हैं। उनके हमलों को लेकर क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ी हैं। ऐसे माहौल में इजरायल की सैन्य भागीदारी सऊदी अरब को एक नए क्षेत्रीय संघर्ष में खींच सकती है।
सऊदी नेतृत्व के लिए सुरक्षा हितों के साथ-साथ घरेलू जनमत और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में इजरायल के प्रस्ताव को लेकर सावधानी बरतने की बात सामने आई है।
नेतन्याहू और सऊदी नेतृत्व के बीच राजनीतिक मतभेद
Saudi Arabia Israel Houthi Conflict रिपोर्टों के मुताबिक, नेतन्याहू की कोशिश रही है कि अमेरिका के सहयोग से सऊदी अरब के साथ संबंध सामान्य किए जाएं। हालांकि, फिलिस्तीनी मुद्दे पर दोनों देशों के रुख में अंतर बना हुआ है।
एक अन्य रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से पहले सऊदी नेतृत्व ने इजरायल को संभावित खतरे के बारे में चेतावनी दी थी। इस दावे और उससे जुड़े घटनाक्रम पर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन दावों को स्वतंत्र रूप से पुष्ट तथ्य के बजाय रिपोर्टों में किए गए दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
फिलहाल, यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ इजरायल की संभावित सैन्य भागीदारी और सऊदी अरब की कथित असहमति को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं है। घटनाक्रम पर दोनों देशों की ओर से औपचारिक बयान आने के बाद ही तस्वीर अधिक साफ हो सकेगी।


