BY: Yoganand Shrivastva
Sugar Prices कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने देश में बढ़ती चीनी की कीमतों और घटते स्टॉक को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। खड़गे ने सवाल उठाया कि दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल भारत को आखिर विदेश से चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत के दावे से जोड़कर देखा।
तीन महीने में करीब 40 फीसदी बढ़े चीनी के दाम
Sugar Prices देश के कई शहरों में चीनी की खुदरा कीमत 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात सामने आई है। पिछले तीन महीनों में चीनी के दाम करीब 40 फीसदी तक बढ़े हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान कीमत में लगभग 19 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है।

खड़गे ने केंद्र सरकार से चीनी के स्टॉक में आई कमी को लेकर भी जवाब मांगा। उन्होंने सवाल किया कि भारत जैसे बड़े चीनी उत्पादक देश में स्टॉक नौ साल के निचले स्तर पर पहुंचने की स्थिति क्यों बनी।
10 लाख टन रॉ शुगर के आयात पर सवाल
Sugar Prices घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन रॉ शुगर यानी कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के मंगाने की अनुमति दी है। खड़गे ने इसी फैसले को लेकर सरकार से सवाल किया कि जब भारत चीनी उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में है, तो विदेश से चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है।
Sugar Prices उन्होंने एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि एक ओर विदेश से चीनी मंगाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन में किया जा रहा है।
सरकार ने एथेनॉल को बताया कीमत बढ़ने की वजह नहीं
Sugar Prices केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में वृद्धि के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के अनुसार, घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम से गन्ने की फसल को नुकसान और अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का दबाव कीमत बढ़ने की प्रमुख वजहों में शामिल हैं।

सरकार के अनुसार, 20 जुलाई को चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 48 रुपये प्रति किलो थी, जो बढ़कर 56 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। वहीं, एक्स-मिल कीमत भी कुछ दिनों में 47-48 रुपये से बढ़कर करीब 62 रुपये प्रति किलो हो गई।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हुआ है। हालांकि, चीनी के दाम और घरेलू स्टॉक में कमी को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।




