wholesale-inflation : खाने-पीने की चीजें और रोजमर्रा के सामान महंगे, तेल की कीमतें बढ़ीं तो और बढ़ सकती है महंगाई
By: Digital Desk
wholesale-inflation : नई दिल्ली, देश में थोक महंगाई दर (WPI) फरवरी 2026 में बढ़कर 2.13 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह पिछले 12 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इससे पहले जनवरी 2026 में थोक महंगाई 1.81 प्रतिशत थी, जबकि दिसंबर 2025 में यह 0.83 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
कॉमर्स मंत्रालय ने सोमवार (16 मार्च) को थोक महंगाई के ताजा आंकड़े जारी किए। आंकड़ों के मुताबिक रोजमर्रा की जरूरत के सामान और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण महंगाई दर में इजाफा हुआ है।

wholesale-inflation : खाने-पीने की चीजें हुईं महंगी
फरवरी में प्राइमरी आर्टिकल्स यानी रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामानों की महंगाई दर 2.21 प्रतिशत से बढ़कर 3.27 प्रतिशत हो गई। वहीं फूड इंडेक्स की महंगाई दर माइनस 1.41 प्रतिशत से बढ़कर 1.85 प्रतिशत तक पहुंच गई।
इसके अलावा फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर भी माइनस 4.01 प्रतिशत से बढ़कर माइनस 3.78 प्रतिशत हो गई। वहीं मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की महंगाई दर मामूली बढ़कर 2.92 प्रतिशत दर्ज की गई।
wholesale-inflation : महंगाई बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। इससे पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं, जिससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और इसका असर फल-सब्जी समेत अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
wholesale-inflation : फरवरी में रिटेल महंगाई भी बढ़ी
फरवरी में रिटेल महंगाई दर (CPI) भी बढ़कर 3.21 प्रतिशत पर पहुंच गई है। जनवरी 2026 में यह 2.74 प्रतिशत थी।
wholesale-inflation : क्या होता है WPI?
होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) उस कीमत को दर्शाता है, जिस पर थोक बाजार में व्यापारी एक-दूसरे को सामान बेचते हैं। यदि लंबे समय तक थोक महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो उत्पादक इसकी लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं।
भारत में महंगाई को दो तरीकों से मापा जाता है
CPI (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) यानी खुदरा महंगाई
WPI (होलसेल प्राइस इंडेक्स) यानी थोक महंगाई
wholesale-inflation : इन कारणों से बढ़ी थोक महंगाई दर
देश में फरवरी 2026 के दौरान थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 2.13 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 12 महीनों का उच्चतम स्तर है। थोक महंगाई बढ़ने के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
सबसे बड़ा कारण खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी है। अनाज, सब्जियां, फल और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से फूड इंडेक्स में तेजी आई है। इसके साथ ही प्राइमरी आर्टिकल्स यानी कृषि से जुड़े उत्पादों की कीमतों में भी उछाल देखने को मिला है।
दूसरा बड़ा कारण ईंधन और ऊर्जा से जुड़ी लागत है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर वैश्विक स्तर पर तेल महंगा होता है तो पेट्रोल-डीजल की लागत बढ़ती है, जिससे परिवहन और माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है। इसका असर फल-सब्जी, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उत्पादन लागत बढ़ने से भी थोक महंगाई प्रभावित होती है। फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल, धातु, केमिकल और प्लास्टिक जैसे उत्पादों की कीमत बढ़ने से तैयार सामान भी महंगे हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव से भी तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो आने वाले महीनों में महंगाई पर और दबाव बढ़ने की आशंका है। इस तरह खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि, ऊर्जा लागत और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां थोक महंगाई बढ़ने के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
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