BY: Yoganand Shrivastva
Filmi news: ‘मिर्जापुर’ सीरीज में रॉबिन के किरदार से घर-घर पहचान बनाने वाले अभिनेता प्रियांशु पैन्यूली की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। कभी पत्रकार बनने का सपना देखने वाले प्रियांशु कॉलेज में कम उपस्थिति के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, लेकिन यही मोड़ उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
हाल ही में वह कृति सेनन और धनुष के साथ फिल्म ‘तेरे इश्क में’ में नजर आए, जहां उनके अभिनय को दर्शकों ने काफी सराहा। इंडिया टीवी हिंदी से खास बातचीत में प्रियांशु ने अपने संघर्ष, फैसलों और सीखों को खुलकर साझा किया।
प्रियांशु ने बताया कि स्कूल और कॉलेज के दिनों से ही उनका झुकाव स्टेज और सांस्कृतिक गतिविधियों की ओर था। डांस, ड्रामा और थिएटर उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके थे। इसी वजह से पढ़ाई प्रभावित हुई और अटेंडेंस कम हो गई। हालांकि, इस स्थिति ने उन्हें यह समझने का मौका दिया कि उनका असली रास्ता फिल्मों और अभिनय की दुनिया में ही है।
परिवार की सहमति से उन्होंने फिल्म मेकिंग की पढ़ाई करने का फैसला किया। इस दौरान उन्होंने एक न्यूज चैनल में इंटर्नशिप की, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाई, म्यूजिक वीडियो और कॉर्पोरेट विज्ञापनों पर काम किया। साथ ही थिएटर और शॉर्ट फिल्मों के जरिए अभिनय का अनुभव भी लगातार बढ़ाते रहे।
मुंबई पहुंचने के बाद संघर्ष का असली दौर शुरू हुआ। आर्मी बैकग्राउंड से आने के बावजूद उन्होंने आरामदायक जिंदगी छोड़ दी। गुजारे के लिए उन्होंने चाय बनाना, गाड़ी चलाना, बैकस्टेज काम करना, लाइट और साउंड संभालना जैसे हर छोटे-बड़े काम किए, लेकिन ऑडिशन देना कभी नहीं छोड़ा।
आउटसाइडर होने की चुनौतियों पर बात करते हुए प्रियांशु कहते हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में बाहर से आने वालों को सबसे पहले खुद को संभालना और शहर में टिके रहना सीखना पड़ता है। साथ ही अपनी कला को लगातार निखारना, फिटनेस और लुक पर ध्यान देना और मौके का इंतजार करना भी इस सफर का हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में ऑडिशन तक पहुंचना भी आसान नहीं था। थिएटर में काम करते हुए उन्हें कास्टिंग टीम की नजर में आने का मौका मिला। पृथ्वी थिएटर में किए गए एक नाटक के दौरान मुकेश छाबड़ा की टीम ने उन्हें देखा और वहीं से उनके करियर को नई दिशा मिली।
स्टारकिड्स और आउटसाइडर्स की तुलना पर प्रियांशु का मानना है कि दोनों के संघर्ष अलग-अलग तरह के होते हैं। जहां इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को सिस्टम की समझ पहले से होती है, वहीं बाहर से आए कलाकारों को हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ता है। लेकिन आउटसाइडर्स पर परिवार के नाम का दबाव नहीं होता, बल्कि अगला मौका पाने की चुनौती होती है।
प्रियांशु पैन्यूली की यह यात्रा साबित करती है कि अगर जुनून सच्चा हो, मेहनत निरंतर हो और धैर्य बना रहे, तो कॉलेज ड्रॉपआउट से लेकर चमकते सितारे तक का सफर भी मुमकिन है।





