कहानी आलू की: ज़हर से ज़ायका बनने तक का सफर, जब ‘शैतान का सेब’ बना हर थाली का राजा

- Advertisement -
Swadesh NewsAd image

Concept&writer: Yoganand Shrivastva

अगर किसी सब्ज़ी को ‘भारत का राजा’ कहा जाए, तो बिना किसी वोटिंग के यह ताज आलू के सिर पर सजता है। पर यह कहानी सिर्फ एक सब्ज़ी की नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘क्रांति’ की है जिसने पूरी दुनिया की रसोई, खेती और इतिहास को बदल दिया। यह वही आलू है जिसे कभी जहरीला कहा गया, जिसे यूरोप में लोग छूने से डरते थे, जिसे चर्च ने ‘शैतान का फल’ करार दिया था — और आज वही आलू हर थाली का सबसे प्यारा, सबसे ज़रूरी हिस्सा है। समोसे से लेकर चिप्स तक, फ्रेंच फ्राई से लेकर परांठे तक — हर स्वाद में आलू की मौजूदगी है। लेकिन आलू का यह सफर आसान नहीं था; यह एक लंबी, दिलचस्प और कभी-कभी डरावनी यात्रा है — जंगलों से प्लेट तक की कहानी।

सबसे पहले चलते हैं लगभग 10,000 साल पीछे, दक्षिण अमेरिका के पहाड़ी इलाकों की ओर — एंडीज़ पर्वतमाला के पास। यही वो इलाका था जहाँ के लोग, जिन्हें आज हम पेरू और बोलीविया के मूलवासी कहते हैं, सबसे पहले आलू की खेती करते थे। वहाँ की ठंडी जलवायु में लोग ‘क्विनोआ’ और ‘मकई’ के साथ-साथ इस अजीब-से कंद को भी उगाते थे। यह आलू वैसा नहीं था जैसा हम आज खाते हैं — वह छोटा, कड़वा और कई बार हल्का जहरीला होता था। लेकिन आदिवासी लोग होशियार थे। उन्होंने उसे धूप में सुखाकर, पानी में भिगोकर, उसकी जहरीली परत को निकालना सीख लिया। और तब से वह उनका मुख्य भोजन बन गया। उन्हें पता था कि यह मिट्टी में उगता है, ज्यादा पानी नहीं मांगता, और ठंडे मौसम में भी भूख मिटा सकता है।

1530 के दशक में जब स्पेनी विजेता (कॉनक्विस्टाडोर) दक्षिण अमेरिका पहुँचे, तो उन्होंने बहुत कुछ लूटा — सोना, चांदी, और साथ में यह अजीब सी चीज़ भी लेकर आए — आलू। वे सोच भी नहीं सकते थे कि यह छोटा-सा कंद एक दिन यूरोप की किस्मत बदल देगा। 1570 के आस-पास आलू पहली बार स्पेन पहुँचा। लेकिन वहाँ उसका स्वागत नहीं हुआ, बल्कि डर हुआ। लोग उसे ‘शैतान का सेब’ (Devil’s Apple) कहने लगे। वजह यह थी कि यह पौधा नाइटशेड फैमिली का हिस्सा है — उसी परिवार का जिससे तम्बाकू, बेलाडोना और जहरभरी डेडली नाइटशेड जैसे पौधे आते हैं। इनमें से कई जहरीले होते हैं। यूरोप के किसानों ने जब पहली बार आलू देखा, तो उसके फूलों और हरे फलों को देख सोचा कि यह ज़हर है। और सच कहें तो वे पूरी तरह गलत भी नहीं थे — क्योंकि कच्चे आलू और उसकी पत्तियों में सोलानिन नाम का जहरीला रसायन होता है।

लोग उसे खाने से डरते थे, और कई जगहों पर तो उसे जानवरों का चारा बना दिया गया। आलू खेतों में उगता जरूर था, लेकिन लोगों की थाली में नहीं आता था। फ्रांस और जर्मनी में तो उसे दुष्ट आत्माओं का फल माना गया। चर्च ने भी कहा — “जो चीज़ ज़मीन के नीचे छिपी है, वो पवित्र नहीं हो सकती।” यहां तक कि एक समय फ्रांस के किसानों ने आलू की खेती करने वालों के खिलाफ विरोध भी किया।

फिर आया कहानी का मोड़ — फ्रांस का ‘अलू-क्रांति’ वाला वैज्ञानिक, जिसका नाम था एंटोनी-पार्मेंटियर (Antoine-Augustin Parmentier)। 18वीं सदी के इस आदमी ने आलू के लिए वह किया, जो भारत में गांधीजी ने चरखे के लिए किया था — एक आंदोलन छेड़ दिया। पार्मेंटियर ने सात साल तक युद्ध में कैद रहते हुए सिर्फ आलू खाकर जिंदा रहा। जब वह लौटा, तो उसने समझा कि यह कंद भूख मिटा सकता है। उसने राजा लुई XVI और रानी मैरी एंटोइनेट को मनाया कि वे आलू का प्रचार करें। रानी ने तो अपने बालों में आलू के फूल सजाकर फैशन बनाया, और राजा ने सैनिकों को आदेश दिया — “राजधानी के पास आलू की फसल उगाओ, लेकिन दिन में नहीं, रात में पहरा दो।” लोगों में जिज्ञासा जगी — “जो चीज़ राजा छिपाकर रखता है, वह खास होगी।” धीरे-धीरे लोगों ने चोरी-छिपे आलू खाना शुरू किया — और यही आलू की असली जीत थी।

19वीं सदी तक आते-आते आलू ने यूरोप की रसोई पर राज करना शुरू कर दिया। यह सस्ता था, पौष्टिक था, और गरीबों का पेट भरता था। लेकिन फिर एक और झटका आया — 1845 का ‘आयरिश पोटैटो फेमिन’, यानी आलू अकाल। उस साल आलू की फसलों में एक फफूंदी फैल गई जिसने पूरे आयरलैंड की खेती बर्बाद कर दी। करोड़ों लोग भूख से मरे, लाखों को देश छोड़ना पड़ा। लेकिन इस त्रासदी ने एक नई बात साबित की — कि आलू अब यूरोप का मुख्य भोजन बन चुका था।

भारत में आलू की एंट्री भी औपनिवेशिक दौर में हुई। कहा जाता है कि 16वीं सदी के अंत या 17वीं सदी की शुरुआत में आलू सबसे पहले पुर्तगालियों के जरिए भारत पहुँचा। वे गोवा और कोच्चि के बंदरगाहों से इसे लाए। धीरे-धीरे यह बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक फैल गया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने सैनिकों के भोजन में शामिल किया, क्योंकि यह सस्ता और टिकाऊ था। भारतीय किसानों ने भी जल्दी समझ लिया कि यह मिट्टी में उगने वाला अनमोल सोना है।

और फिर आलू भारत में बस गया — जैसे कोई विदेशी मेहमान जो परिवार का हिस्सा बन जाए। पहले लोग उसे ‘विदेशी सब्ज़ी’ मानते थे, लेकिन धीरे-धीरे उसने हर भारतीय रसोई में अपनी जगह बना ली। आज उत्तर भारत के परांठे, दक्षिण भारत के मसाला डोसे, बंगाल का आलू-पोस्तो, महाराष्ट्र का वड़ा-पाव, गुजरात का समोसा — हर जगह आलू का स्वाद है। कोई त्योहार हो, व्रत हो या रोज़ की दाल-रोटी, आलू हर जगह फिट बैठता है।

आलू ने सिर्फ खाने की आदतें नहीं बदलीं, बल्कि खेतों की अर्थव्यवस्था भी बदल दी। इसकी पैदावार आसान थी, मिट्टी में जल्दी उगता था, और बाकी फसलों से ज्यादा उत्पादन देता था। यही वजह है कि आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है। हर साल करोड़ों टन आलू उगाए जाते हैं — जो खेत से निकलकर फैक्ट्री तक जाते हैं, और फिर आपके हाथों में चिप्स, स्नैक्स और फ्रेंच फ्राइज बनकर पहुंचते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि वैज्ञानिकों ने जब आलू का जेनेटिक अध्ययन किया, तो पता चला कि जंगली आलू में सच में जहरीले तत्व मौजूद होते थे। लेकिन इंसानों ने सदियों की चयन प्रक्रिया (Selective Breeding) से उन जहरीले गुणों को हटाकर इसे खाने लायक बना लिया। यानी इंसान और आलू, दोनों ने एक-दूसरे को बदल दिया।

आज आलू सिर्फ सब्ज़ी नहीं, एक भावना है। कोई बच्चा खाने में नखरे करे तो मां कहती है — “ठीक है, आज आलू बना देती हूं।” दुनिया के हर कोने में कोई न कोई डिश ऐसी है जिसमें आलू मुख्य भूमिका निभाता है। और यही वजह है कि इसे कहते हैं — “सब्ज़ियों का राजा।”

एक वक्त था जब इसे ‘शैतान का सेब’ कहा गया, और आज वही आलू दुनिया के सबसे ज़्यादा खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल है। उसने साबित कर दिया कि कभी-कभी जिसे दुनिया ठुकरा देती है, वही सबसे बड़ा ताज पहनता है। शायद इसी के लिए कहा गया है — “हर ज़हर में दवा छिपी होती है, बस पहचानने वाला चाहिए।”

आलू की कहानी हमें यही सिखाती है — जो मिट्टी में छिपा रहता है, वही असली ताकत रखता है।

Lifestyle : घर पर बनाएं एलोवेरा नेचुरल कंडीशनर: रूखे और बेजान बालों को मिलेगी नई चमक और मजबूती

Lifestyle केमिकल युक्त हेयर प्रोडक्ट्स, बढ़ता प्रदूषण और खराब जीवनशैली के कारण

New Delhi : 12 फरवरी ‘भारत बंद’ अलर्ट: बैंक, स्कूल और बाजार पर क्या होगा असर? जानें अपनी जरूरत की हर बात

New Delhi विभिन्न केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों ने अपनी मांगों

Morena : शादी की खुशियों में पड़ा खलल: बारात के दरवाजे पर दूल्हे के भाई से 4 लाख की लूट

संवाददाता- प्रताप सिंह बघेल Morena : शहर के कोतवाली थाना क्षेत्र स्थित एक

Dindori: कलेक्टर की जनसुनवाई में उमड़ा जनसैलाब, 100 आवेदनों पर त्वरित समाधान के निर्देश

रिपोर्टर- मोहम्मद रफी खान Dindori जिला मुख्यालय पर आयोजित साप्ताहिक जनसुनवाई में

Janjgir Champa Road Accident BamhniDih: बम्हनीडीह में तेज रफ्तार पिकअप की टक्कर से युवक की मौत

Janjgir Champa Road Accident BamhniDih: बाइक सवार की दर्दनाक मौत, अनियंत्रित पिकअप

Morena :भारत बनेगा विश्व की तीसरी आर्थिक शक्ति, रूस को छोड़ेंगे पीछे: महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी

संवाददाता- प्रताप सिंह बघेल Morena : जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद

Singrauli : NCL में गूंजी इंकलाब की आवाज: मशाल जुलूस के साथ 12 फरवरी की देशव्यापी हड़ताल का शंखनाद

Report: Suresh kumar Singrauli नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) के श्रमिक क्षेत्रों में