UNSC : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को यूरोप के एक और देश का मजबूत समर्थन मिला है। भारत दौरे पर आए लक्जमबर्ग के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर और विदेश मंत्री जेवियर बेटेल ने भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिए जाने की वकालत की है। उन्होंने सवाल उठाया कि दुनिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण देशों में शामिल भारत को अब तक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी स्थान क्यों नहीं मिला है।
बेटेल के बयान ऐसे समय आए हैं, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार तेज हो रही है। विकासशील देश और ग्लोबल साउथ लंबे समय से मौजूदा व्यवस्था में बदलाव और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं। भारत भी सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे को आज की वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बदलने की जरूरत पर जोर देता रहा है।
UNSC : भारत के आकार और वैश्विक महत्व का दिया हवाला
न्यूज एजेंसी ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, जेवियर बेटेल ने कहा कि अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाता है तो भारत को उसमें शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने भारत के आकार, वैश्विक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय मामलों में बढ़ती भूमिका का हवाला देते हुए कहा कि इन परिस्थितियों में भारत का स्थायी सदस्य न होना सवाल खड़ा करता है।
“For me, India belongs” at UNSC: Luxembourg Deputy PM Bettel backs Security Council reforms, calls veto a “relic of 2nd World War”
— ANI Digital (@ani_digital) September 7, 2026
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बेटेल ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने भारत के साथ ब्राजील जैसे बड़े देशों को भी विस्तारित सुरक्षा परिषद में स्थायी प्रतिनिधित्व देने की बात कही। उनके मुताबिक, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था में प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ना जरूरी है।
UNSC : ‘भारत अभी भी इसमें क्यों नहीं है?’, बेटेल ने उठाया सवाल
लक्जमबर्ग के विदेश मंत्री ने भारत की दावेदारी का समर्थन करते हुए कहा कि अगर आज सुरक्षा परिषद की सदस्यता को नए सिरे से तय किया जाए तो भारत को इसमें शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने भारत के आकार और उसके वैश्विक महत्व को इस दावे का प्रमुख आधार बताया।
उनका कहना था कि दुनिया की मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को देखते हुए सुरक्षा परिषद का वर्तमान स्वरूप पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। दुनिया में शक्ति संतुलन और देशों की भूमिका में बड़ा बदलाव आ चुका है, इसलिए वैश्विक संस्थाओं की संरचना में भी उसी के अनुरूप परिवर्तन होना चाहिए।
UNSC : वीटो पावर में बदलाव के भी पक्ष में लक्जमबर्ग
जेवियर बेटेल ने केवल सुरक्षा परिषद के विस्तार की बात नहीं की, बल्कि वीटो पावर की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि किसी एक देश को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामूहिक फैसलों को रोकने की क्षमता मिलना आज की वैश्विक व्यवस्था के हिसाब से उचित नहीं है।
उन्होंने मौजूदा वीटो सिस्टम को दूसरे विश्व युद्ध के दौर की व्यवस्था से जोड़ते हुए इसमें बुनियादी बदलाव की जरूरत बताई। बेटेल के मुताबिक, सुरक्षा परिषद में ऐसा सुधार होना चाहिए जिससे किसी एक देश की वीटो शक्ति के कारण सामूहिक निर्णय हमेशा के लिए बाधित न हो सकें।
UNSC : दो-तिहाई बहुमत से वीटो खत्म करने का सुझाव
लक्जमबर्ग के विदेश मंत्री ने वीटो व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, जिसमें सुरक्षा परिषद में दो-तिहाई बहुमत के जरिए वीटो को रद्द किया जा सके।
उनका मानना है कि सुरक्षा परिषद के विस्तार और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी और लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है। इससे परिषद में लिए जाने वाले फैसलों पर किसी एक देश का अत्यधिक प्रभाव कम किया जा सकता है।
UNSC : तीन दिन की भारत यात्रा पर हैं जेवियर बेटेल
जेवियर बेटेल 7 से 9 सितंबर तक तीन दिन की आधिकारिक भारत यात्रा पर हैं। इस दौरान उनके भारत के साथ विभिन्न द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करने की उम्मीद है। उनकी यात्रा के कार्यक्रम में चेन्नई का दौरा भी शामिल है, जहां वे IIT मद्रास में आयोजित कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे।
भारत यात्रा के दौरान UNSC सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता पर उनकी टिप्पणी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि यूरोपीय देशों की ओर से भारत की दावेदारी के समर्थन को नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक रूप से अहम माना जाता है।
UNSC : भारत लंबे समय से UNSC में सुधार की मांग कर रहा
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा सुरक्षा परिषद की संरचना आज की दुनिया की वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती। वर्तमान व्यवस्था मुख्य रूप से 1945 के बाद की वैश्विक परिस्थितियों को दर्शाती है, जबकि पिछले आठ दशकों में दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक स्थिति में काफी बदलाव आया है।
भारत का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता में भी कई गुना वृद्धि हुई है और दुनिया के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सुरक्षा परिषद के स्थायी ढांचे में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। ऐसे में परिषद को अधिक प्रतिनिधित्व वाला, प्रभावी और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
UNSC : अगस्त में भारत ने भी सुधारों को बताया था जरूरी
19 अगस्त 2026 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कामकाज के तरीकों को लेकर हुई खुली बहस के दौरान भारत ने एक बार फिर तत्काल सुधारों की जरूरत पर जोर दिया था। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की कार्यवाहक प्रमुख योजना पटेल ने कहा था कि सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और जरूरी हो गई है।
उन्होंने 1945 की दुनिया और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था के बीच अंतर का उल्लेख करते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता उस समय के मुकाबले कई गुना बढ़ चुकी है। उनके मुताबिक, आठ दशक पहले की परिस्थितियों में हुए संघर्षों और घटनाओं के आधार पर सुरक्षा परिषद की संरचना और उसके काम करने के तरीके को हमेशा के लिए तय नहीं किया जा सकता।
UNSC : ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी अहम
UNSC में सुधार की बहस केवल भारत की स्थायी सदस्यता तक सीमित नहीं है। विकासशील देशों का समूह यानी ग्लोबल साउथ भी संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। इन देशों का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय वास्तविकताओं को सुरक्षा परिषद की संरचना में पर्याप्त जगह नहीं मिली है।
भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भी पेश करता रहा है और सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग के साथ विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व पर जोर देता है। ऐसे में लक्जमबर्ग की ओर से भारत की स्थायी सदस्यता और व्यापक UNSC सुधार का समर्थन इस बहस को और मजबूती देता है।


