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UN ने बदला दुनिया का नक्शा, अफ्रीका को मिलेगा उसका असली आकार; 164 देशों ने किया समर्थन, अमेरिका ने किया विरोध

UN: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के नक्शे को लेकर एक अहम प्रस्ताव का समर्थन किया है। इस प्रस्ताव के तहत ऐसे नक्शे को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जिसमें अफ्रीका और दुनिया के दूसरे महाद्वीपों का क्षेत्रफल ज्यादा वास्तविक नजर आता है। टोगो की ओर से पेश किए गए ‘मैप को सही करें’ प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 164 देशों का समर्थन मिला। इनमें फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल रहे।

अमेरिका ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। वहीं छह देशों ने वोटिंग से दूरी बनाए रखी। अमेरिकी पक्ष की ओर से इसे एक वैचारिक एजेंडा बताया गया और कहा गया कि इससे दूसरे महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान भटक सकता है।

UN: संयुक्त राष्ट्र का फैसला बाध्यकारी नहीं, लेकिन असर बड़ा

संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह निर्णय कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है। इसके बावजूद इसका असर दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले नक्शों पर पड़ सकता है। स्कूलों, किताबों, संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे विश्व मानचित्र को लेकर अब नई बहस तेज हो सकती है।

नए प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि दुनिया का नक्शा केवल देशों की भौगोलिक स्थिति बताने का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे लोगों के मन में अलग-अलग देशों और महाद्वीपों के आकार और महत्व की धारणा भी बनती है। इसलिए नक्शे में मौजूद क्षेत्रफल संबंधी विकृतियों को ठीक करना जरूरी है।

UN: सदियों से इस्तेमाल हो रहा है मर्केटर नक्शा

दुनिया के स्कूलों और किताबों में आम तौर पर दिखाई देने वाला नक्शा ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ पर आधारित है। इसे 1569 में फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने तैयार किया था। इसका मूल उद्देश्य समुद्री यात्राओं और नेविगेशन को आसान बनाना था।

मर्केटर प्रोजेक्शन में धरती की गोल सतह को एक सपाट नक्शे पर दिखाया जाता है। इस प्रक्रिया में खासकर ध्रुवों के आसपास मौजूद क्षेत्रों का आकार वास्तविकता की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देने लगता है, जबकि भूमध्य रेखा के करीब स्थित इलाकों का आकार अपेक्षाकृत छोटा नजर आता है।

UN: अफ्रीका और ग्रीनलैंड के आकार में कितना अंतर?

मर्केटर नक्शे की सबसे ज्यादा चर्चा होने वाली विसंगतियों में अफ्रीका और ग्रीनलैंड का उदाहरण दिया जाता है। नक्शे में दोनों क्षेत्र लगभग समान आकार के दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल में दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है।

अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना अधिक है। अफ्रीका इतना विशाल महाद्वीप है कि उसके भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान और यूरोप के बड़े हिस्से को एक साथ रखने के बाद भी काफी जगह बच सकती है।

यही वजह है कि अफ्रीकी देशों और नक्शा विशेषज्ञों का एक वर्ग लंबे समय से मौजूदा विश्व मानचित्र में सुधार की मांग करता रहा है।

UN: धरती को सपाट नक्शे पर दिखाना क्यों मुश्किल?

मौजूदा नक्शे की समस्या को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पृथ्वी गोलाकार है, जबकि कागज या स्क्रीन सपाट होती है। इसलिए ग्लोब की सतह को दो आयामी नक्शे में बदलते समय किसी न किसी तरह का भौगोलिक विकृत रूप सामने आता है।

मर्केटर प्रोजेक्शन में समुद्री रास्तों और दिशा को दिखाने में फायदा मिलता था, लेकिन इसका नुकसान यह हुआ कि अलग-अलग अक्षांशों पर स्थित क्षेत्रों का वास्तविक आकार समान अनुपात में दिखाई नहीं देता।

UN: ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ क्या है?

मर्केटर नक्शे की इसी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से 2018 में नक्शा विशेषज्ञों की एक टीम ने ‘इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन’ तैयार किया। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है।

इस प्रोजेक्शन में अफ्रीका का आकार मर्केटर नक्शे की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देता है। दूसरी तरफ यूरोप, रूस और ग्रीनलैंड जैसे उत्तरी हिस्सों का आकार पहले की तुलना में छोटा नजर आता है। ब्राजील और दक्षिण अमेरिका भी इस प्रोजेक्शन में ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं।

UN: अफ्रीकी संघ के 54 देशों ने भी दिया समर्थन

प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र में समर्थन मिलने से पहले अफ्रीकी संघ के 54 सदस्य देशों ने भी इस तरह के मानचित्र को अपनाने का समर्थन किया था। फरवरी में अफ्रीकी देशों ने कहा था कि इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन अफ्रीका समेत सभी महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा वास्तविक तरीके से प्रस्तुत करता है।

अफ्रीकी संघ के देशों का तर्क है कि लंबे समय तक इस्तेमाल किए गए मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का आकार वास्तविकता से बहुत छोटा दिखाई देता है। इससे दुनिया के लोगों के बीच महाद्वीप की भौगोलिक विशालता को लेकर गलत धारणा बन सकती है।

UN: ‘करैक्ट द मैप’ अभियान ने क्या कहा?

‘करैक्ट द मैप’ नाम से चल रहे ऑनलाइन अभियान ने भी नए प्रोजेक्शन के पक्ष में आवाज उठाई है। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि अफ्रीका के भीतर दुनिया के कई बड़े देशों और क्षेत्रों को समायोजित किया जा सकता है और उसके बाद भी महाद्वीप में पर्याप्त जगह बचती है।

इस अभियान का उद्देश्य केवल नक्शे की तकनीकी खामी को सामने लाना नहीं है, बल्कि लोगों को यह समझाना भी है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के आकार को देखने का हमारा नजरिया पुराने नक्शों से प्रभावित हुआ है।

UN: टोगो ने रखा प्रस्ताव, विदेश मंत्री ने दिया बड़ा बयान

‘मैप को सही करें’ प्रस्ताव टोगो की ओर से संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किया गया था। इस पहल को अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों का व्यापक समर्थन मिला। प्रस्ताव पर मतदान से पहले टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी ने कहा था कि एक ज्यादा न्यायपूर्ण दुनिया की शुरुआत एक ज्यादा न्यायपूर्ण नक्शे से होनी चाहिए।

उनके बयान को फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट का भी समर्थन मिला। बैरोट ने संकेत दिया कि फ्रांस का विदेश मंत्रालय अब मर्केटर प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को बंद करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

UN: अफ्रीकी देशों ने इसे ‘कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म’ से जोड़ा

अफ्रीकी देशों के लिए यह मुद्दा केवल नक्शे की तकनीकी गलती तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि सदियों से इस्तेमाल हो रहे नक्शे ने अफ्रीका को उसकी वास्तविक भौगोलिक विशालता से छोटा दिखाने में भूमिका निभाई है।

इसी संदर्भ में कुछ अफ्रीकी देशों ने इसे ‘कार्टोग्राफिक कॉलोनियलिज्म’ यानी नक्शों के जरिए उपनिवेशवादी नजरिए को बनाए रखने से जोड़ा है। उनका तर्क है कि जब किसी महाद्वीप को लगातार छोटा दिखाया जाता है, तो लोगों के मन में उसके आकार, क्षमता और वैश्विक महत्व को लेकर भी वैसी ही धारणा विकसित हो सकती है।

UN: नक्शे की विकृति से विकास की धारणा पर भी असर

प्रस्ताव के समर्थकों का मानना है कि नक्शे में अफ्रीका को छोटा दिखाने का असर केवल भूगोल तक नहीं रहता। इससे महाद्वीप की आर्थिक क्षमता, प्राकृतिक संसाधनों, निवेश की संभावनाओं और विकास की क्षमता को लेकर भी वैश्विक धारणा प्रभावित हो सकती है।

अफ्रीकी पक्ष का कहना है कि वास्तविक आकार को सही ढंग से दिखाने वाला नक्शा लोगों को यह समझने में मदद करेगा कि अफ्रीका दुनिया का कितना विशाल और विविध महाद्वीप है।

UN: अब दुनिया के नक्शे में क्या बदलाव दिखेगा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का समर्थन मिलने के बाद दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले मानचित्रों को लेकर बदलाव की चर्चा तेज हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अगले दिन से सभी स्कूलों, किताबों या डिजिटल सेवाओं पर एक ही नया नक्शा दिखाई देने लगेगा।

फिर भी 164 देशों के समर्थन से यह मुद्दा वैश्विक स्तर पर मजबूत हुआ है। आने वाले समय में ज्यादा संस्थान ऐसे मानचित्रों को अपना सकते हैं, जिनमें महाद्वीपों का क्षेत्रफल वास्तविकता के करीब दिखाई देता है। इस बदलाव के साथ दुनिया को देखने का एक पुराना भौगोलिक नजरिया भी बदल सकता है।

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