BY
Yoganand Shrivastava
New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) के तहत मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों का हकदार नहीं रहेगा। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि ईसाई धर्म अपनाने और उसका सक्रिय पालन करने वाला व्यक्ति अपनी मूल जाति का दर्जा खो देता है।

New Delhi संविधान के 1950 के आदेश की व्याख्या
शीर्ष अदालत ने ‘संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950’ के खंड 3 का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रतिबंध पूर्ण है। इस आदेश के अनुसार, केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों के अलावा किसी अन्य मत (जैसे ईसाई या इस्लाम) में धर्मांतरण करता है, तो जन्म के आधार पर मिलने वाला SC का दर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

New Delhi आरक्षण और कानूनी संरक्षण पर रोक
अदालत ने अपने फैसले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि धर्मांतरित व्यक्ति संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा बनाए गए किसी भी विशेष कानून, आरक्षण या वैधानिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकता। खंड 3 के तहत जो व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता, उसे SC/ST एक्ट के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण भी प्राप्त नहीं होगा। कोर्ट ने साफ किया कि इसमें किसी भी प्रकार का कोई अपवाद (Exception) स्वीकार्य नहीं है।

New Delhi पादरी द्वारा दर्ज केस को माना अवैध
यह पूरा मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और वह पादरी के रूप में कार्यरत था। उसने अपने ऊपर हुए हमले के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। आरोपियों ने इस मुकदमे को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि धर्म परिवर्तन के बाद पादरी अब अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि एक व्यक्ति सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन करते हुए साथ-साथ अनुसूचित जाति की सदस्यता का दावा नहीं कर सकता।
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