by: vijay nandan
भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई के समय समुद्र पर पत्थर का पुल बनवाया था. बानर सेना में नल-नील नाम के दो बंदर थे, जो पत्थरों पर श्रीराम का नाम लिखकर समुद्र में डालते थे। पत्थर पानी में नहीं डूबे और रामसेतु (एडम ब्रिज) ऐसे बनकर तैयार हुआ. भारत के रामेश्वरम और श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच प्राकृतिक चूना पत्थर की बनी 48 किलोमीटर लंबी आज भी श्रृंखला है। ये आज भी दुनिया के लिए कौतूहल का विषय है। ऐसे ही एक रहस्य की वैज्ञानिकों ने खोज की है। जानिए इस आर्टिकल में विस्तार से..
दुनिया के सबसे बड़े पुरातात्त्विक रहस्यों में से एक ईस्टर द्वीप (Easter Island) के विशाल पत्थर के सिरों (Moai Statues) का रहस्य अब आखिरकार काफी हद तक सुलझ गया है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने यह पता लगा लिया है कि ये विशाल मूर्तियाँ अपने स्थान तक कैसे पहुंचीं। प्रशांत महासागर में स्थित छोटे से द्वीप रापा नुई (Rapa Nui) पर मौजूद विशाल मूर्तियाँ 12 से 80 टन तक वजनी हैं। सदियों से वैज्ञानिक यह सोचते रहे कि इस द्वीप की प्राचीन सभ्यता ने इतनी भारी मूर्तियों को बिना आधुनिक तकनीक के आखिर कैसे दूर-दूर तक पहुंचाया होगा। पहले यह माना जाता था कि इन मूर्तियों को जमीन पर लिटाकर रस्सियों से घसीटा गया होगा। लेकिन अब नए वैज्ञानिक शोध ने इस परंपरागत धारणा को गलत साबित कर दिया है।

नई खोज: मूर्तियाँ “चलकर” पहुँचीं अपनी जगह
अमेरिका की बिंघमटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कार्ल लिपो (Carl Lipo) और एरिज़ोना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टेरी हंट (Terry Hunt) के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में यह साबित किया गया कि ये मूर्तियाँ वास्तव में “चलकर” अपने स्थानों तक पहुँचीं। शोधकर्ताओं ने 3D मॉडलिंग और वास्तविक प्रयोगों का इस्तेमाल किया और पाया कि रापा नुई के लोगों ने रस्सियों की मदद से मूर्तियों को हिलाकर एक ज़िग-ज़ैग तरीके से आगे बढ़ाया। इस प्रक्रिया में मूर्ति को दोनों तरफ से रस्सियों से खींचा जाता था, जिससे वह बाएं और दाएं झूलती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ती थी। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब कहते हैं “मोई (Moai) मूर्तियाँ चलीं, खींची नहीं गईं।

अध्ययन में शामिल वैज्ञानिकों ने लगभग 1,000 मोई मूर्तियों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि इन मूर्तियों को “चलने” के लिए ही डिज़ाइन किया गया था। इन मूर्तियों का आधार ‘D-आकार’ (D-shaped base) का होता है और उनका झुकाव आगे की ओर होता है, जिससे जब उन्हें साइड से हिलाया जाता है, तो वे स्वतः आगे बढ़ती हैं।
जब एक बार मूर्ति हिलने लगती है, तो उसे चलाना मुश्किल नहीं होता। यह ऊर्जा की बचत करती है और तेज़ी से आगे बढ़ती है। असली कठिनाई सिर्फ उसे हिलाने की शुरुआत में होती है। वैज्ञानिकों ने प्रयोग के लिए 4.35 टन वजनी एक प्रतिकृति (Replica Moai) बनाई, जिसकी बनावट बिल्कुल असली मूर्तियों जैसी थी। सिर्फ 18 लोगों की टीम ने मिलकर इस मूर्ति को 100 मीटर तक मात्र 40 मिनट में आगे बढ़ा दिया। यह पहले किए गए किसी भी प्रयास की तुलना में कई गुना तेज़ था। प्रोफेसर लिपो का कहना है कि भौतिकी के सिद्धांत के हिसाब से यह पूरी तरह तार्किक है। जैसे-जैसे मूर्तियाँ बड़ी होती हैं, यह तकनीक और प्रभावी साबित होती है, क्योंकि इन्हें केवल इसी तरह चलाया जा सकता है।
ईस्टर द्वीप का इतिहास
13वीं शताब्दी: पोलिनेशियाई नाविकों द्वारा द्वीप पर बसावट की शुरुआत।
14वीं से 15वीं शताब्दी: मूर्तियों का तेजी से निर्माण शुरू हुआ।
1600: माना गया कि इस समय द्वीप की संस्कृति का पतन हुआ, लेकिन निर्माण कार्य तब भी जारी था।
1722: डच नाविकों ने पहली बार द्वीप खोजा — तब मूर्तियाँ धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग हो रही थीं।
1774: ब्रिटिश खोजकर्ता जेम्स कुक ने जब द्वीप देखा, तब तक कई मूर्तियाँ गिर चुकी थीं।
‘मोई रोड्स’: मूर्तियों के चलने के रास्ते
शोधकर्ताओं ने द्वीप पर फैले उन रास्तों का भी अध्ययन किया जिन पर मूर्तियाँ लाई गई थीं। ये रास्ते लगभग 4.5 मीटर चौड़े और थोड़े अवतल आकार के हैं, जिससे मूर्तियों को झुलाते हुए चलाना आसान हो जाता था। कई स्थानों पर गिरी हुई मूर्तियों के नीचे खुदाई के निशान मिले, जिससे संकेत मिलता है कि लोग उन्हें सीधा करने की कोशिश कर रहे थे। यह भी साबित करता है कि मूर्तियाँ सचमुच “चलकर” आगे बढ़ाई जाती थीं। यह अध्ययन न केवल एक पुरातात्त्विक रहस्य को सुलझाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि रापा नुई के लोग कितने बुद्धिमान, संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम थे। प्रोफेसर लिपो ने कहा कि यह दिखाता है कि रापा नुई के लोग बेहद समझदार थे। उन्होंने यह अनोखा तरीका खोजा। हमें उनसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
मोई मूर्तियों का अर्थ
निर्माण काल: 1250 से 1500 ईस्वी के बीच।
संख्या: लगभग 887 मूर्तियाँ।
ऊंचाई: औसतन 13 फीट (लगभग 4 मीटर)।
सामग्री: ज्वालामुखीय पत्थर (Tuff) और लाल टोपी (Scoria) से बनी।
अर्थ: इन्हें पूर्वजों की आत्माओं और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
स्थिति: अधिकांश मूर्तियाँ द्वीप की ओर मुंह करके हैं यानी वे अपने लोगों पर “निगरानी” रखती हैं।
ईस्टर द्वीप के मोई सिरों की रहस्यमयी यात्रा का रहस्य आखिरकार सामने आ गया है। सदियों पुरानी यह पहेली अब विज्ञान और परंपरा के मेल से सुलझ गई है। ये मूर्तियाँ न केवल पत्थर के ढेर हैं, बल्कि मानव बुद्धि, तकनीक और रचनात्मकता का जीवंत प्रमाण भी हैं।
(स्रोत: अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध एवं विश्वविद्यालय अध्ययन रिपोर्ट)





