Isa Ahmad
Rape Survivor Abortion Case में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रायपुर जिले की एक नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर सुनवाई करते हुए अत्यंत संवेदनशील और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़िता को 25 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने (गर्भपात) की अनुमति दे दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सोनोग्राफी रिपोर्ट में दर्शाई गई गर्भ की अवधि केवल एक अनुमान है और इसे पीड़िता के मौलिक एवं संवैधानिक अधिकारों को नकारने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
Rape Survivor Abortion Case: अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार को दी सर्वोच्च प्राथमिकता
Rape Survivor Abortion Case की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि दुष्कर्म के कारण ठहरा गर्भ पीड़िता के लिए गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात का कारण बनता है। ऐसे गर्भ को आगे बढ़ाने के लिए विवश करना उसके जीवन और गरिमा पर सीधा प्रहार है। अदालत ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट या सोनोग्राफी से प्राप्त गर्भ की अवधि अंतिम सत्य नहीं मानी जा सकती और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त स्वास्थ्य तथा गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के सामने तकनीकी या चिकित्सीय सीमाओं को बाधक नहीं बनने दिया जा सकता।
Rape Survivor Abortion Case: मेकाहारा में 24 घंटे के भीतर भर्ती और डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने के निर्देश
Rape Survivor Abortion Case में अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए त्वरित और कड़े निर्देश जारी किए। न्यायालय ने रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को आदेश दिया कि वे 24 घंटे के भीतर पीड़िता को डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल (मेकाहारा), रायपुर में भर्ती कराएं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम की निगरानी में उसकी पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए Medical Termination of Pregnancy (MTP) की प्रक्रिया पूरी करें। साथ ही अदालत ने पुलिस जांच और आरोपी के खिलाफ साक्ष्य सुरक्षित रखने के लिए भ्रूण के डीएनए सैंपल को कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखने का भी आदेश दिया है।
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Rape Survivor Abortion Case में यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सामान्यतः Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act के तहत 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था में गर्भपात पर कानूनी और चिकित्सीय प्रतिबंध रहता है। हाईकोर्ट के इस निर्णय ने यह नजीर स्थापित की है कि जब किसी नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य का प्रश्न हो, तो अदालतें मानवीय दृष्टिकोण और संवैधानिक अधिकारों को सर्वोपरि मान सकती हैं।



