Report: Ram yadav
Raisen: जिले के ग्राम साईंखेड़ा में इन दिनों भक्ति, राष्ट्रवाद और आध्यात्मिक चेतना का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। अवसर है 11 कुंडी महायज्ञ और श्रीराम कथा के भव्य आयोजन का, जिसने समूचे सिलवानी अंचल को ‘राममय’ कर दिया है। कथा के दौरान जगद्गुरु दिनेशाचार्य जी महाराज ने जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाते हुए बताया कि संसारिक मोह-माया से परे ईश्वर के साथ संबंध स्थापित करना ही मानव जीवन की असली सफलता है।

सत्संग और सदाचार: जीवन की नई दिशा का आधार
Raisen जगद्गुरु दिनेशाचार्य जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सत्संग केवल सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का मार्ग है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जिस प्रकार दर्पण धूल साफ करने के काम आता है, वैसे ही सत्संग मनुष्य के विचारों की शुद्धि करता है। महाराज जी के अनुसार, भारत की पावन धरा पर जन्म लेना ही सौभाग्य की बात है, क्योंकि यह वह भूमि है जहाँ देवता भी अवतार लेने को लालायित रहते हैं। उन्होंने कुंभ जैसे महान पर्वों का उदाहरण देते हुए बताया कि हमारी सनातन संस्कृति पूरे विश्व को ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (सभी सुखी हों) के मंत्र के साथ शांति और सद्भाव का संदेश देती है।

धर्म और राष्ट्र: एक-दूसरे के अविभाज्य अंग
Raisen कथा के ओजस्वी वाचन के दौरान महाराज जी ने राष्ट्रभक्ति का अलख जगाते हुए कहा कि धर्म और राष्ट्र को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने देश की आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को नमन करते हुए कहा कि हमें एक ऐसे सशक्त और समरस समाज का निर्माण करना चाहिए, जो बुराइयों से मुक्त और संस्कारों से युक्त हो। उनके अनुसार, सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बाहरी शक्तियां इसे कभी कमजोर नहीं कर सकतीं, बशर्ते हम अपनी जड़ों और अपने स्वाभिमान से जुड़े रहें।
रामचरितमानस: आदर्श जीवन और चरित्र निर्माण का दर्पण
Raisen भगवान शिव-पार्वती संवाद और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रसंगों के माध्यम से जगद्गुरु ने पारिवारिक मूल्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के दौर में हर माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को राम जैसा मर्यादित और आज्ञाकारी बनने की प्रेरणा दें। राजा दशरथ के वचन पालन और श्रीराम के त्याग का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि रामचरितमानस का पाठ हमें एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाता है। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि नियमित मानस पाठ करने वाला व्यक्ति भले ही ‘राम’ न बन पाए, लेकिन वह कभी ‘रावण’ भी नहीं बनता—वह एक नीतिवान और चरित्रवान इंसान जरूर बनता है।





