अंगदान: क्यों कहा जाता है ‘महादान’ और कौन थे पहले दाता

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BY: Yoganand Shrivastva

कहा जाता है कि सबसे बड़ा दान विद्या दान है, लेकिन आधुनिक समय में एक और दान है जिसे ‘महादान’ कहा जाता है—वह है अंगदान। हर साल 13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को अंगदान के महत्व के प्रति जागरूक करना और यह समझाना है कि एक व्यक्ति की पहल कई जिंदगियों को बचा सकती है।

भारत में हर साल हजारों मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें लिवर, किडनी, हार्ट या आंखों जैसे अंगों की तत्काल आवश्यकता होती है। दुर्भाग्यवश, समय पर डोनर न मिलने के कारण कई मरीजों की मृत्यु हो जाती है। जबकि एक ब्रेन-डेड व्यक्ति के अंग लगभग आठ लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं।


पौराणिक संदर्भ: महर्षि दधीचि

अंगदान का सबसे पुराना उदाहरण हिंदू पुराणों में मिलता है, जहां महर्षि दधीचि ने देवताओं की सहायता के लिए अपने शरीर की हड्डियां दान कर दीं। इन हड्डियों से वज्र नामक दिव्य हथियार बना, जिससे इंद्रदेव ने असुर वृत्रासुर का वध किया। यह कथा आज भी निस्वार्थ त्याग और परोपकार का प्रतीक है।


आधुनिक युग में पहला अंगदान

आधुनिक चिकित्सा में पहला सफल अंगदान 1954 में हुआ, जब रोनाल्ड ली हेरिक ने अपनी किडनी अपने जुड़वां भाई को दान की। यह प्रत्यारोपण डॉ. जोसेफ मरे ने किया था, और इसे पहला सफल मानव अंग प्रत्यारोपण माना जाता है।


प्रत्यारोपण का विकास

  • 1960 का दशक: लिवर, हार्ट और पैंक्रियाज के प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक शुरू हुए।
  • 1980 का दशक: फेफड़ों और आंतों के अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रियाएं शुरू हुईं।
  • थॉमस अर्ल स्टारज़ल को आधुनिक अंग प्रत्यारोपण का पिता कहा जाता है, जिन्होंने पहला मानव लिवर प्रत्यारोपण किया।

शुरुआती चुनौतियां

1950 से 1970 के बीच, अंग प्रत्यारोपण संस्थाएं अपने स्तर पर ही दाता और प्राप्तकर्ता खोजती थीं। कोई केंद्रीकृत व्यवस्था न होने के कारण कई अंग समय पर सही मरीज तक नहीं पहुंच पाते थे। आज, अंगदान और प्रत्यारोपण नेटवर्क ने इस प्रक्रिया को तेज और संगठित बना दिया है।


अंगदान करने की प्रक्रिया

  1. किसी सरकारी या प्रमाणित संस्था की वेबसाइट पर जाएं।
  2. डोनर फॉर्म डाउनलोड करें और सावधानी से भरें।
  3. फॉर्म पर दो लोगों के हस्ताक्षर कराएं, जिनमें एक करीबी रिश्तेदार हो।
  4. फॉर्म जमा करने के बाद डोनर कार्ड जारी होगा, जो आपके पते पर भेजा जाएगा।
  5. परिवार और करीबी लोगों को अपनी इच्छा के बारे में जरूर बताएं।
  6. रजिस्ट्रेशन न होने पर भी मृत्यु के बाद, परिवार की सहमति से अंगदान संभव है।

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