BY: Yoganand Shrivastva
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि शादी का रजिस्ट्रेशन न होना शादी को अमान्य नहीं बनाता। कोर्ट ने कहा कि रजिस्ट्रेशन केवल शादी का प्रमाण देने का माध्यम है और इससे शादी की वैधता प्रभावित नहीं होती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला आजमगढ़ की फैमिली कोर्ट के एक आदेश को रद्द करने के बाद आया। फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता सुनील दुबे से 29 जुलाई 2025 तक शादी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जमा करने को कहा था। सुनील दुबे ने कोर्ट में कहा कि उनके पास रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट नहीं है और हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत यह अनिवार्य नहीं है। उनकी पत्नी ने भी इस अनुरोध का समर्थन किया। फैमिली कोर्ट ने 31 जुलाई को उनकी अर्जी खारिज कर दी, जिसके बाद हाई कोर्ट का रुख किया गया।
हाई कोर्ट का फैसला
जस्टिस मनीष निगम ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत विधिवत शादी होने पर राज्य सरकारें रजिस्ट्रेशन के नियम बना सकती हैं। लेकिन यदि रजिस्ट्रेशन न हो या रजिस्टर में इसका उल्लेख न हो, तो भी शादी की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई नियम ऐसा नहीं हो सकता जो रजिस्ट्रेशन न होने पर शादी को अमान्य घोषित करे।
रजिस्ट्रेशन का उद्देश्य
कोर्ट ने कहा कि शादी का रजिस्ट्रेशन केवल शादी का प्रमाण देने का साधन है। हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 8(5) के तहत रजिस्ट्रेशन न होने से शादी की वैधता पर सवाल नहीं उठता। विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में भी यही सिद्धांत अपनाया गया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि यदि शादी हिंदू मैरिज एक्ट के तहत विधिवत हुई है, तो रजिस्ट्रेशन न होना शादी की वैधता को प्रभावित नहीं करता। रजिस्ट्रेशन केवल प्रशासनिक सुविधा और प्रमाण के लिए है।





