by: vijay nandan
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता तनाव न सिर्फ दो देशों की दुश्मनी का प्रतीक है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक और धार्मिक संघर्ष का भी नतीजा है, जो सदियों से चला आ रहा है। येरुशलम, धर्म, सत्ता और पहचान—ये चारों पहलू इस विवाद के केंद्र में हैं। लेकिन क्या केवल यही कारण हैं? या इसके पीछे भू-राजनीतिक खेल भी शामिल हैं?
आइए समझते हैं कि इस जटिल संघर्ष की जड़ें कहां तक फैली हैं, क्या है येरुशलम का विवाद, और दुनिया के किन-किन देशों की नीतियां इस आग को हवा दे रही हैं।
येरुशलम: विवाद का केंद्र या प्रतीक?
येरुशलम सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि तीन प्रमुख धर्मों—यहूदी, इस्लाम और ईसाई—के लिए आस्था का प्रतीक है।
- यहूदी मानते हैं कि यहीं उनका पवित्र मंदिर (टेम्पल माउंट) था।
- मुसलमानों के लिए यह तीसरा सबसे पवित्र स्थान है, जहां अल-अक्सा मस्जिद स्थित है।
- ईसाईयों के लिए यह यीशु मसीह के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का स्थान है।
यही धार्मिक महत्ता येरुशलम को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाती है।

ईरान और इज़राइल: टकराव की पृष्ठभूमि
ईरान और इज़राइल के बीच टकराव की जड़ें धार्मिक से ज़्यादा राजनीतिक हैं।
- ईरान खुद को इस्लामी जगत का नेतृत्वकर्ता मानता है और फलस्तीन के मुद्दे पर हमेशा से इज़राइल विरोधी रहा है।
- दूसरी ओर, इज़राइल एक यहूदी राष्ट्र है, जिसे मुस्लिम देशों ने लंबे समय तक मान्यता नहीं दी।
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशन (1979) के बाद से ही उसने इज़राइल के अस्तित्व को चुनौती देना शुरू कर दिया। वहीं, इज़राइल भी ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को अपने लिए बड़ा खतरा मानता है।
कब-कब बढ़ा तनाव: प्रमुख घटनाएं
- 2006: लेबनान स्थित हिज़्बुल्ला और इज़राइल के बीच युद्ध, जिसमें ईरान ने हिज़्बुल्ला को समर्थन दिया।
- 2010 के बाद: इज़राइल ने सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर कई हवाई हमले किए।
- 2020: अमेरिका द्वारा ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या, इज़राइल की भूमिका को लेकर आरोप।
- 2023-24: गाज़ा में हमास और इज़राइल के बीच युद्ध, जिसमें ईरान ने हमास का खुला समर्थन किया।
कौन-कौन से देश हैं इज़राइल के खिलाफ?
- ईरान: सबसे मुखर विरोधी, हथियार और फंडिंग के जरिए कई आतंकी संगठनों को समर्थन।
- सीरिया: ईरान का रणनीतिक सहयोगी, इज़राइल के खिलाफ मोर्चा।
- लेबनान: हिज़्बुल्ला के जरिए अप्रत्यक्ष युद्ध में शामिल।
- कतर: हमास को समर्थन देने वाले देशों में शामिल।
- तुर्की: येरुशलम को लेकर बार-बार इज़राइल की आलोचना करता रहा है।
भारत और बाकी दुनिया का रुख
भारत समेत कई देश इस संघर्ष को लेकर सतर्क हैं। भारत ने हमेशा से दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है, जहां इज़राइल और फलस्तीन दोनों को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अधिकार हो।
अमेरिका खुलकर इज़राइल के पक्ष में रहता है, जबकि रूस और चीन अवसरवादी नीति अपनाते हुए दोनों पक्षों से संबंध बनाए रखते हैं।
क्या समाधान संभव है?
ईरान और इज़राइल के बीच संघर्ष सिर्फ दो देशों का मसला नहीं, बल्कि यह एक बड़े वैचारिक युद्ध का रूप ले चुका है। धार्मिक आस्था, राजनीतिक सत्ता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इस उलझे हुए ताने-बाने में येरुशलम सिर्फ एक प्रतीक भर नहीं, बल्कि जज़्बात, इतिहास और रणनीति का केंद्र बन चुका है। यदि वैश्विक शक्तियां ठोस कदम नहीं उठातीं, तो यह टकराव पूरे पश्चिम एशिया को लंबे समय तक अशांति में झोंक सकता है।





