BY: MOHIT JAIN
भारत ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अब भारत को समुद्र के गहरे हिस्सों में छिपे कीमती खनिजों की खोज करने का विशेष अधिकार मिला है। यह दुनिया में पहली बार है जब किसी देश को कार्ल्सबर्ग रिज (Carlsberg Ridge) में पॉलीमेटैलिक सल्फर नोड्यूल्स (Polymetallic Sulphur Nodules) की तलाश का लाइसेंस दिया गया हो।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण (ISA) से विशेष अनुबंध
अंतरराष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण (ISA) ने भारत को उत्तर-पश्चिम भारतीय महासागर में स्थित कार्ल्सबर्ग रिज में कीमती खनिज खोजने की अनुमति दी है।
- यह समझौता 15 सितंबर 2025 को दिल्ली में हस्ताक्षरित हुआ।
- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. रविचंद्रन ने पुष्टि की कि भारत इस तरह का लाइसेंस पाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।
कार्ल्सबर्ग रिज: कहां और कितना बड़ा क्षेत्र
- यह क्षेत्र अरब सागर और उत्तर-पश्चिम भारतीय महासागर में करीब 3,00,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है।
- यह भारत और अरब टेक्टोनिक प्लेट की सीमा बनाता है।
- यह रोड्रीग्स द्वीप (Rodrigues Island) से लेकर ओवेन फ्रैक्चर जोन (Owen Fracture Zone) तक फैला हुआ है।
समुद्र के नीचे छिपे ये ‘गुच्छे’ क्या हैं?
समुद्र की गहराई में मिलने वाले ये पत्थर जैसे ‘गुच्छे’ नोड्यूल्स कहलाते हैं। इनमें कई बहुमूल्य खनिज मौजूद होते हैं, जैसे:
- मैंगनीज
- कोबाल्ट
- निकल
- कॉपर
ये खनिज बैटरियों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और अन्य उद्योगों में अहम भूमिका निभाते हैं। भारत की यह खोज देश के औद्योगिक क्षेत्र को बड़ा फायदा दिला सकती है।
भारत ने कैसे पाया यह अधिकार
- जो समुद्री क्षेत्र किसी देश की सीमा में नहीं आते, उन्हें हाई सीज़ कहा जाता है।
- ऐसे क्षेत्रों में काम करने के लिए ISA से अनुमति लेनी होती है।
- अब तक 19 देशों को ही ऐसे क्षेत्रों में खोज की मंज़ूरी मिली है।
- भारत ने जनवरी 2024 में दो क्षेत्रों, कार्ल्सबर्ग रिज और अफनासी-निकितिन समुद्री पर्वत—में खोज के लिए आवेदन किया था।
- कार्ल्सबर्ग रिज में मंजूरी मिल गई है, लेकिन अफनासी-निकितिन क्षेत्र के लिए अब भी अनुमति लंबित है।
अफनासी-निकितिन समुद्री पर्वत और विवाद
इस क्षेत्र में खोज की मंजूरी पर श्रीलंका ने भी दावा किया है। UNCLOS (United Nations Convention on the Laws of the Sea) के अनुसार कोई देश अपने तट से 350 समुद्री मील तक महाद्वीपीय शेल्फ का दावा कर सकता है। बंगाल की खाड़ी में यह सीमा 500 समुद्री मील तक मानी जाती है।
भारत के पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स
भारत को समुद्र में खनिज खोज के अधिकार पहले भी मिल चुके हैं:
- मार्च 2002 में पहला कॉन्ट्रैक्ट (वैधता मार्च 2027 तक)
- सितंबर 2016 में दूसरा कॉन्ट्रैक्ट (वैधता सितंबर 2031 तक)
इनके तहत भारत पहले से समुद्र में खनिज खोज कर रहा है।
यह खोज क्यों अहम है
समुद्र के गहरे हिस्सों से खनिज निकालना तकनीकी और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। अभी तक समुद्र तल के पर्यावरणीय प्रभाव पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसके बावजूद,
- बैटरियों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है।
- कई देश इसे रणनीतिक दृष्टि से अहम मानते हैं और केवल दावा सुरक्षित रखने के लिए भी लाइसेंस लेते हैं।
भारत की यह पहल न सिर्फ औद्योगिक विकास बल्कि रणनीतिक बढ़त देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।





