कैसे सीएफएसएल चुटकियों में सुलझा देता है जटिल मर्डर केस? जानिए फॉरेंसिक साइंस लैब का पूरा सिस्टम

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BY: Yoganand Shrivastva

जब देश में कोई बड़ी आपराधिक घटना होती है—चाहे वो निर्भया केस जैसा जघन्य अपराध हो या कोलकाता का आरजी कर मेडिकल केस—तो एक नाम हमेशा सामने आता है: सीएफएसएल यानी सेंट्रल फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी। ये वही संस्था है जो सबूतों के दम पर सबसे उलझे हुए केसों को भी हल करने में मदद करती है।

क्या है सीएफएसएल?

सीएफएसएल एक केंद्रीय वैज्ञानिक संस्था है, जो फोरेंसिक तकनीकों के जरिए अपराधों की तह तक जाती है। अपराध स्थल से इकट्ठे किए गए सबूतों की बारीकी से जांच कर यह संस्था उन्हें ऐसे तथ्यों में बदल देती है, जो अदालत में सबूत बनते हैं।

कहां-कहां हैं इसकी लैब्स?

भारत में सीएफएसएल की शाखाएं दिल्ली, हैदराबाद, चंडीगढ़, कोलकाता, पुणे और गुवाहाटी जैसे शहरों में स्थित हैं। हर लैब अत्याधुनिक उपकरणों और अनुभवी वैज्ञानिकों से लैस होती है।

सीएफएसएल कैसे करता है काम?

सीएफएसएल मुख्य रूप से सीबीआई, एनआईए, एनसीबी, और विभिन्न राज्य पुलिस बलों द्वारा भेजे गए केसों की जांच करता है। केस मिलने के बाद ये संस्था उस घटना से जुड़े वैज्ञानिक प्रमाण जुटाने पर काम शुरू करती है। इसके लिए इनके पास अलग-अलग विशेषज्ञ विभाग होते हैं:

  • डीएनए प्रोफाइलिंग यूनिट
  • बैलिस्टिक यूनिट (हथियारों की जांच)
  • फिंगरप्रिंट एनालिसिस
  • फॉरेंसिक बायोलॉजी व केमिस्ट्री
  • फॉरेंसिक डॉक्यूमेंट एनालिसिस
  • डिजिटल फॉरेंसिक्स
  • फॉरेंसिक फोटोग्राफी

अपराध स्थल से जो भी चीजें मिलती हैं—जैसे खून के धब्बे, बाल, अंगुलियों के निशान, मोबाइल फोन, हथियार या दस्तावेज—उन्हें लैब में भेजा जाता है। फिर शुरू होता है तकनीकी जांच का सिलसिला।

वैज्ञानिक जांच कैसे सुलझाती है मर्डर मिस्ट्री?

  • डीएनए टेस्टिंग से यह तय किया जाता है कि किसी भी अपराध स्थल पर मिला खून या ऊतक किस व्यक्ति से जुड़ा है।
  • बैलिस्टिक जांच यह बताती है कि गोली किस तरह के हथियार से चलाई गई थी।
  • डिजिटल डिवाइस की फॉरेंसिक जांच के जरिए डिलीट हुए चैट्स, कॉल रिकॉर्ड्स, लोकेशन डेटा, फोटो और वीडियो को रिकवर किया जाता है।
  • फिंगरप्रिंट मिलान से आरोपी की पहचान सुनिश्चित की जाती है।

क्यों होती है सीएफएसएल रिपोर्ट इतनी अहम?

सीएफएसएल की रिपोर्ट अदालतों में सबूत के रूप में मान्यता प्राप्त होती हैं। ऐसे मामलों में जहां कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं होता, वहां वैज्ञानिक सबूत ही केस का रुख तय करते हैं।

पुलवामा आतंकी हमला, सुशांत सिंह राजपूत की मौत और दिल्ली दंगे जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों में सीएफएसएल की जांच रिपोर्ट्स ने केस को निर्णायक मोड़ दिया।

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