रिपोर्टर: विकास भार्गव
गुना जिले की चांचौड़ा तहसील में पार्वती-काली सिंधनदी जोड़ो परियोजना के तहत घाटाखेड़ी बांध के निर्माण को लेकर किसानों में भारी आक्रोश देखने को मिला। प्रभावित गांवों से आए करीब 500 से अधिक किसान ट्रैक्टर रैली के साथ गुना पहुंचे और प्रशासन के सामने अपना विरोध दर्ज कराया।
किसानों ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी हालत में बड़ा बांध नहीं बनने देंगे। प्रदर्शनकारी किसानों का कहना था कि प्रशासन चाहे तो उन्हें बेघर और बेदखल कर दे, लेकिन बांध का निर्माण रोका जाना चाहिए।
कलेक्टर से हुई गहमा-गहमी

किसानों ने गुना कलेक्ट्रेट में ज्ञापन सौंपते समय कलेक्टर से भी बातचीत की। प्रदर्शन के दौरान कलेक्टर ने किसानों को चेतावनी दी कि कोई कानून को हाथ में न ले और बातचीत की रिकॉर्डिंग जारी रहेगी।
इस मौके पर किसानों की अगुवाई कर रहे नेताओं ने भी प्रशासन को चुनौती दी। राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह, बमौरी विधायक इंजीनियर ऋषि अग्रवाल और चांचौड़ा की पूर्व विधायक ममता मीना ने दशहरा मैदान में किसानों को संबोधित किया और उनका हौसला बढ़ाया।
किसानों का मुख्य मुद्दा: घाटाखेड़ी न डूबने पाए

विधायक जयवर्धन सिंह ने कहा कि यह समझ से परे है कि सरकार उपजाऊ और बसाए गए गांवों को बांध परियोजना के लिए क्यों डुबोना चाहती है। उनका कहना था कि ऐसे निर्णय से सड़कें, स्कूल और अस्पताल सहित पूरी बुनियादी संरचना प्रभावित होगी।
जयवर्धन ने आश्वासन दिया कि वे इस मुद्दे को भोपाल जाकर मुख्यमंत्री के सामने रखेंगे।
पूर्व विधायक ममता मीना ने भी परियोजना के खिलाफ केंद्र और राज्य सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने बताया कि परियोजना के तहत 80 से 100 गांव डूबने की संभावना है। उनका कहना था कि प्रशासन दो छोटे बांध बनाए, जिससे चांचौड़ा विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह सिंचित हो सके और आसपास के जिलों को भी पानी का लाभ मिल सके।
प्रशासन का पक्ष और किसानों की नाराजगी
कलेक्टर ने ज्ञापन लेने के बाद कहा कि सिंचाई विभाग के अधिकारी गांव-गांव शिविर लगाकर किसानों के भ्रम को दूर करेंगे। उन्होंने बताया कि PKC परियोजना उन गांवों के लिए भी फायदेमंद होगी जो पार्वती नदी से दूर हैं और पानी की समस्या से जूझ रहे हैं।
इस बात से किसान भड़क गए और नारों के साथ अपनी असहमति जताई।
गुना में घाटाखेड़ी बांध को लेकर किसानों का विरोध जोर पकड़ रहा है। स्थानीय नेता और पूर्व विधायक किसानों के साथ हैं और प्रशासन से छोटे बांध के विकल्प पर विचार करने की मांग कर रहे हैं। यह मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी अहम बन सकता है।





