Dollar Economy : तेल, सोना और डॉलर के संकट से अन्नदाता दिला सकता है मुक्ति
Vijay Nandan डिजिटल एडिटर
Dollar Economy : भारत का कृषि प्रधान समाज आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां उसे तय करना है कि भविष्य पूरी तरह पेट्रोल-डीजल और रासायनिक खेती पर टिकेगा या फिर प्रकृति, पशुधन और पारंपरिक ज्ञान के सहारे आत्मनिर्भर बनेगा।
भारत का हृदय प्रदेश Madhya Pradesh पिछले डेढ़ दशक में कृषि उत्पादन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हुआ है। आधुनिक तकनीक, सिंचाई सुविधाओं और कृषि संसाधनों के विस्तार ने उत्पादन तो बढ़ाया, लेकिन खेती की लागत भी कई गुना बढ़ा दी।
आज किसान अधिक उपज लेने के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है – डीजल आधारित खेती, महंगे रासायनिक खाद, मशीनों पर बढ़ती निर्भरता और प्राकृतिक संसाधनों का लगातार क्षरण।

Dollar Economy : मध्यप्रदेश और देश पर बढ़ता कर्ज
मध्यप्रदेश में किसानों की संख्या लगभग 1 करोड़ मानी जाती है। इनमें बड़ी संख्या सीमांत और लघु किसानों की है, जिनकी खेती 1 से 2 हेक्टेयर के बीच सीमित है। खेती की लागत बढ़ने के कारण किसानों पर कर्ज लगातार बढ़ रहा है।
उधर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार पर भी ऋण का बोझ बढ़ता जा रहा है। भारत का कुल बाहरी ऋण (External Debt) 2025 के अंत तक लगभग 765 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
यदि इसे देश की आबादी पर विभाजित करें तो हर नागरिक पर हजारों रुपये का अप्रत्यक्ष ऋण बैठता है।
इसी बीच भारत की सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा आयात है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 88 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है।
Dollar Economy : विदेशी तेल पर निर्भर भारत
भारत हर साल अरबों डॉलर खर्च कर कच्चा तेल खरीदता है। FY25 में भारत का कच्चे तेल और पेट्रोलियम आयात बिल लगभग 161 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि खेती से लेकर परिवहन तक सबकुछ पेट्रोल-डीजल पर निर्भर हो गया है।
आज किसान खेत जोतने से लेकर बुवाई, सिंचाई और कटाई तक ट्रैक्टर और मशीनों पर निर्भर है। गांवों में बैल आधारित खेती लगभग समाप्त हो चुकी है।
यदि कभी वैश्विक संकट के कारण तेल सप्लाई बाधित हो जाए तो भारत जैसे देश के सामने खाद्यान्न संकट भी खड़ा हो सकता है। हाल ही में पश्चिम एशिया तनाव के कारण भारतीय रुपये पर दबाव और तेल कीमतों में उछाल देखने को मिला।
Dollar Economy : विदेशी मुद्रा भंडार भी दबाव में
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी लगभग 680 अरब डॉलर के आसपास माना जा रहा है।
लेकिन यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ सकता है। यही वजह है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुकी है।
Dollar Economy : समाधान क्या है? — गोबर इकोनॉमी
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या खेती को पेट्रोल-डीजल से मुक्त किया जा सकता है?
Dollar Economy : इसका जवाब है — हां।
भारत के गांवों में सदियों से पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था रही है। गाय, बैल और अन्य पशु केवल दूध का साधन नहीं थे, बल्कि खेती, खाद, ऊर्जा और ग्रामीण रोजगार की रीढ़ थे।
आज फिर उसी मॉडल को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने की जरूरत है।
Dollar Economy : गोबर से बनेगी ऊर्जा
गोबर से बनने वाली बायोगैस यानी मीथेन गैस खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती है।
यदि देश के करोड़ों किसान परिवार छोटे स्तर पर भी बायोगैस उत्पादन शुरू करें तो एलपीजी और डीजल पर निर्भरता कम हो सकती है।
Dollar Economy : बायोगैस से:
खाना बनाया जा सकता है
बिजली पैदा की जा सकती है
ट्रैक्टर और कृषि उपकरण चलाए जा सकते हैं
गांवों में छोटे उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं
इसके साथ जो स्लरी बचेगी वह प्राकृतिक खाद का काम करेगी, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर खर्च घटेगा।
Dollar Economy : क्यों जरूरी है फिर से पशुपालन?
खेती में मशीनों के बढ़ते उपयोग ने पशुपालन को कमजोर कर दिया। गांवों में बैल खत्म हो गए, चारागाह खत्म हो गए और गायें सड़कों पर भटकने लगीं।
आज स्थिति यह है कि:
दुधारू न रहने पर गायों को छोड़ दिया जाता है
गौवंश सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होता है
किसानों और पशुपालकों के बीच संघर्ष बढ़ता है
यदि गोबर आधारित अर्थव्यवस्था विकसित होती है तो पशुधन फिर से किसानों की आय का स्रोत बन सकता है।
Dollar Economy : चीन आगे निकल गया, हम पीछे रह गए
भारत में 1990 के दशक में गोबर गैस योजना शुरू हुई थी, लेकिन सरकारी उदासीनता और कमजोर क्रियान्वयन के कारण यह व्यापक स्तर पर सफल नहीं हो सकी।
वहीं चीन ने इसी तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाकर ग्रामीण ऊर्जा उत्पादन में बड़ी सफलता हासिल की।
अब भी समय है कि भारत गांव-गांव में आधुनिक बायोगैस प्लांट, प्राकृतिक खेती और एथेनॉल आधारित कृषि उपकरणों को बढ़ावा दे।
Dollar Economy : प्राकृतिक खेती से होंगे कई फायदे
यदि किसान फिर से पशुपालन और जैविक खेती की ओर लौटते हैं तो:
रासायनिक खाद पर खर्च कम होगा
मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी
पानी प्रदूषित होने से बचेगा
खेती की लागत घटेगी
किसानों का कर्ज कम होगा
पर्यावरण संरक्षण होगा
भारत दुनिया को ग्रीन एनर्जी और टिकाऊ कृषि का मॉडल भी दे सकेगा।
अन्नदाता में आज भी है भारत को सुपर पावर बनाने की ताकत
भारत की असली ताकत गांव, किसान और पशुधन हैं।
यदि नीति निर्माता आधुनिक तकनीक को पारंपरिक भारतीय कृषि व्यवस्था के साथ जोड़ दें तो “गोबर इकोनॉमी” केवल एक नारा नहीं बल्कि भारत की नई आर्थिक क्रांति बन सकती है।
भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी बनाने का सपना तभी मजबूत होगा जब गांव आत्मनिर्भर होंगे, किसान कर्जमुक्त होगा और खेती पेट्रोल-डीजल की जगह प्रकृति आधारित ऊर्जा पर चलेगी।
देश के अन्नदाता में आज भी भारत को फिर से “सोने की चिड़िया” बनाने की क्षमता है — जरूरत सिर्फ सही नीति, सही दिशा और सही सोच की है।





