by: vijay nandan
देवरिया: देवरिया के धनगड़ा गांव में रविवार की सुबह वह पल किसी के दिल को पिघला देने वाला था। मतदाता पुनरीक्षण (SIR) ड्यूटी में तैनात 35 वर्षीय लेखपाल आशीष कुमार का शव जब गांव पहुंचा, तो घरवालों की रुलाई पूरे माहौल में गूंज उठी। मां और पत्नी की चीखों के बीच दुख ऐसा था कि देखने वालों की आंखें भी नम हो गईं।
उस दुख के सन्नाटे में जब एसडीएम दिशा श्रीवास्तव गांव पहुंचीं, वह सिर्फ एक अधिकारी नहीं थीं बल्कि एक इंसान थीं, जो सामने बिखरे हुए परिवार को संभालना चाहती थीं। रोती हुई पत्नी का हाथ थामकर उन्होंने धीरे से कहा, “आप अकेली नहीं हैं…पूरा तहसील आपके साथ है।

उनके ये शब्द मात्र सांत्वना नहीं, बल्कि उस संवेदना का प्रतिबिंब थे, जो अक्सर प्रशासनिक जिम्मेदारियों की कठोर परतों के पीछे छिपी रह जाती है। लेकिन उस दिन भावनाएं खुलकर सामने आईं। लेखपाल की पत्नी और मां की आंखों से बहते आंसू देखकर एसडीएम की भी आंखें भर आईं। वह पल सरकारी पद, दायित्व या औपचारिकता से परे था—वह केवल इंसानियत का था।
आशीष कुमार की मौत ड्यूटी के बोझ से हुई या बीमारी से इस पर बहस जारी है। पर परिवार के लिए सच एक ही है। वे अपने बेटे, पति और पुत्र को खो चुके हैं। सामने रखे शव पर सिसकियों के बीच गांव का हर शख्स यही पूछ रहा था, “क्या एक नौकरी इतनी भारी पड़ने लगी है कि जिंदगी ही खत्म हो जाए?”
उस दिन प्रशासन, नेता, अधिकारी सब मौजूद थे। लेकिन भीड़ के बीच जो सबसे गहरी छाप छोड़ गई, वह एक अधिकारी का उन आंसुओं को समझना था। किसी भी सरकारी फाइल या रिपोर्ट में दर्ज नहीं होने वाले उन क्षणों में, एसडीएम दिशा श्रीवास्तव का रो पड़ना परिवार के दर्द का मौन स्वीकार था।
वह रोना शायद किसी आदेश का जवाब नहीं था, न किसी प्रक्रिया का हिस्सा—यह केवल एक इंसान का दूसरी टूट चुकी जिंदगियों के लिए महसूस किया गया दर्द था।





