by: vijay nandan
पटना: बिहार चुनाव 2025 के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सूबे की राजनीति जितनी जटिल है, उतनी ही चौंकाने वाली भी। एक तरफ एनडीए दमदार बढ़त बनाए हुए है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन उम्मीदों के मुकाबले काफी पीछे दिखाई दे रहा है। और सबसे बड़ी चर्चा—प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, जिससे कई बड़े दावे जुड़े थे, उसका खाता तक खुलता नहीं दिख रहा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों नहीं चला पीके का जादू? क्या वजहें रहीं कि एनडीए आगे निकला और महागठबंधन पिछड़ता हुआ नजर आया? आज हम आपको बताएंगे इन तीनों राजनीतिक समीकरणों की पाँच-पाँच बड़ी वजहें, जो इस चुनावी तस्वीर को साफ करती हैं।

पीके का जादू क्यों नहीं चला ?
- नई पार्टी, संगठन कमजोर
जन सुराज एक नई पार्टी थी, जिसका बूथ से लेकर पंचायत स्तर तक मजबूत कैडर तैयार नहीं हो पाया। बिहार में राजनीति जमीनी नेटवर्क पर चलती है, जो पीके नहीं बना सके।
- जातीय समीकरणों में पकड़ कमजोर
बिहार की राजनीति जातीय ध्रुवीकरण पर आधारित है। जन सुराज के पास कोई ठोस जातीय आधार नहीं था, जिससे पार्टी को शुरुआती समर्थन नहीं मिल सका।
- दावों और हकीकत में अंतर
प्रशांत किशोर ने 140 से अधिक सीटें जीतने जैसे बड़े दावे किए, जो जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते थे। इससे मतदाताओं में विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ।
- गठबंधन और संसाधनों की कमी
स्थापित पार्टियों की तरह जन सुराज के पास न धन था, न संसाधन। हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार न मिलने से पार्टी फील्डिंग के स्तर पर भी कमजोर दिखी।
- मुद्दे तो थे, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव नहीं
पीके विकास की बात कर रहे थे, लेकिन बिहार के पारंपरिक वोटर स्थानीय नेता, जाति और गठबंधन की राजनीति से भावनात्मक तौर पर जुड़े रहते हैं। यह कनेक्शन जन सुराज नहीं बना पाई।

क्यों आगे है NDA – 5 बड़ी वजहें
- एनडीए का स्थिर और व्यापक गठबंधन
BJP–JDU का गठजोड़ फिर से मजबूत तरीके से मैदान में था। दोनों दलों का जातीय और क्षेत्रीय आधार एक-दूसरे को पूरक बनाता है।
- महिला और युवा फोकस वाली योजनाएँ
‘लड़कियों की पढ़ाई’, ‘रोजगार स्टार्टअप योजना’, ‘कुशल युवा कार्यक्रम’ और केंद्र की उज्ज्वला–आवास–अनाज योजनाओं ने महिला व गरीब मतदाताओं को मजबूती से जोड़ा।
- मोदी–नीतीश का संयुक्त प्रभाव
केंद्र में मोदी और राज्य में नीतीश कुमार, दोनों की छवि ने स्थिरता और भरोसे का संदेश दिया। यह संदेश ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असरदार रहा।
- बूथ मैनेजमेंट और संगठन की मजबूती
BJP और JDU का जमीनी नेटवर्क बहुत मजबूत है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने वोटिंग को एनडीए के पक्ष में मोड़ दिया।
- कानून-व्यवस्था और विकास का नैरेटिव
एनडीए ने ‘सड़क-पुल-स्कूल’ और ‘कानून-व्यवस्था सुधार’ का मुद्दा लगातार उठाया। महागठबंधन के शासन काल के अपराध बढ़ने के पुराने आरोपों को इस चुनाव में दोबारा उभारा गया।
महागठबंधन क्यों पिछड़ रहा है – 5 बड़ी वजहें
- अंदरूनी खींचतान और समन्वय की कमी
RJD–Congress–Left के बीच टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार रणनीति तक असहमति नजर आई। इससे संगठन एकजुट नहीं दिखा।
- नेतृत्व संकट और स्पष्ट चेहरा नहीं
तेजस्वी यादव पर पूरा भार था, पर एक संयुक्त मुख्यमंत्री चेहरा मजबूती से पेश नहीं किया गया। इससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बनी रही।
- जातीय समीकरण कमजोर पड़े
RJD का MY (मुस्लिम–यादव) समीकरण पहले जैसा ठोस असर नहीं दिखा। कई परंपरागत वोट NDA और छोटे दलों में बंटते गए।
- वादों पर भरोसा नहीं बन पाया
‘नौकरी मॉडल’ और बड़े वादों पर जनता को भरोसा नहीं हुआ। मतदाता इसे चुनावी वादा ज्यादा और लागू करने योग्य योजना कम मान रहे थे।
- ‘जंगलराज’ कुशासन की पुरानी छवि
RJD के ‘जंगलराज’ की पुरानी छवि को NDA ने बार-बार याद दिलाया। इसका असर बाप–दादा स्तर से तय होने वाले वोटरों पर साफ दिखा।





