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बस्तर दशहरा: रावण दहन नहीं, 600 साल पुरानी ‘रथ चोरी’ की अनोखी परंपरा निभाई गई

Bastar Dussehra: Instead of burning Ravana, the unique 600-year-old tradition of 'chariot theft' was performed.

REPORT- MANOJ JANGAM, BY- ISA AHMAD

देशभर में जहां विजयदशमी के अवसर पर रावण दहन किया जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां रावण दहन की जगह 600 साल पुरानी ‘भीतर रैनी’ रस्म निभाई जाती है। इस बार भी गुरुवार और शुक्रवार की आधी रात को यह ऐतिहासिक परंपरा बड़े धूमधाम से संपन्न हुई।

शूर्पणखा से जुड़ा इतिहास

किंवदंती के अनुसार, बस्तर क्षेत्र को कभी रावण की बहन शूर्पणखा का नगर माना जाता था। इसी वजह से यहां रावण दहन की परंपरा नहीं है। इसके विपरीत, बस्तर दशहरे में देवी मां दंतेश्वरी की पूजा की जाती है और इसे शांति व सद्भावना का प्रतीक माना जाता है।

रथ चोरी की अनोखी रस्म

बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता है ‘रथ चोरी’ की रस्म। इस परंपरा में आदिवासी समुदाय हाथ से बने आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को खींचते हैं। इस रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र और तलवार रखी जाती है। आधी रात को रथ चोरी की रस्म निभाई जाती है, जिसे देखने हजारों लोग जुटते हैं।

धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धरोहर

यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और धरोहर भी है। आदिवासी समुदाय इसे अपने गौरव और एकता का प्रतीक मानता है।

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