भारत ने उसी रात खो दिया था अपना प्रधानमंत्री, जानें इसका असर
BY: VIJAY NANDAN (editor swadesh digital)
दिल्ली: हाल ही में पाकिस्तान की ओर से ताशकंद समझौते से पीछे हटने की बात उठाई गई है। यह वही ऐतिहासिक समझौता है जिसने 1965 की भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस समझौते के ठीक बाद भारत ने अपने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को खो दिया था? आइए जानते हैं ताशकंद समझौते का पूरा इतिहास, इसका महत्व, और इससे पीछे हटने का पाकिस्तान का इरादा क्या संकेत देता है।
ताशकंद समझौता क्या था?
ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच 10 जनवरी 1966 को ताशकंद (अब उज्बेकिस्तान की राजधानी) में हुआ था। यह समझौता भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान के बीच हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य 1965 के युद्ध के बाद दोनों देशों के संबंधों को सामान्य करना और सीमा विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना था।

समझौते की मुख्य शर्तें
- युद्ध के दौरान कब्जाई गई जमीनें लौटाई जाएंगी – दोनों देशों ने युद्ध के दौरान एक-दूसरे की जमीन पर जो कब्जा किया था, उसे वापस लौटाने पर सहमति दी।
- राजनयिक संबंध बहाल होंगे – दोनों देशों के बीच राजनयिक और आर्थिक रिश्तों को सामान्य करने की सहमति बनी।
- शांति और मैत्री की भावना – दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का वादा किया।
- बल प्रयोग से बचाव – भारत और पाकिस्तान ने भविष्य में किसी भी विवाद को युद्ध से नहीं, बल्कि बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों से सुलझाने का आश्वासन दिया।
शास्त्री जी की रहस्यमयी मौत
ताशकंद समझौते के ठीक बाद उसी रात (10-11 जनवरी 1966) भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत हो गई। कहा जाता है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, लेकिन उनकी मृत्यु के कारणों को लेकर आज भी कई सवाल उठते हैं। उनकी मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था और आज भी यह एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है।
पाकिस्तान अब क्यों निकलना चाहता है ताशकंद समझौते से?
पाकिस्तान के कुछ राजनीतिक और सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि ताशकंद समझौते के तहत पाकिस्तान को कश्मीर के मुद्दे पर पीछे हटना पड़ा था और यह उसके लिए नुकसानदायक रहा। अब जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया है और वहां विकास की गति तेज हो चुकी है, तो पाकिस्तान का दावा कमजोर हो गया है। ऐसे में ताशकंद समझौते से बाहर निकलने की बात करके पाकिस्तान शायद अंतरराष्ट्रीय मंच पर सहानुभूति और समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है।
भारत पर इसका क्या असर होगा?
भारत के लिए ताशकंद समझौते से पाकिस्तान का निकलना सीधे तौर पर कोई बड़ा कानूनी असर नहीं डालता, क्योंकि यह समझौता राजनीतिक-राजनयिक सहमति के रूप में था, कोई बाध्यकारी संधि नहीं। लेकिन इससे यह संकेत ज़रूर मिलता है कि पाकिस्तान शांति प्रक्रिया की बजाय टकराव की राह पर आगे बढ़ना चाहता है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा हो सकता है।
ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक मोड़ था, जिसने युद्ध के बाद शांति की उम्मीद जगाई थी। हालांकि यह शांति ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई, लेकिन इसने दोनों देशों के राजनयिक रिश्तों में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। आज जब पाकिस्तान इस समझौते से निकलने की बात कर रहा है, तब यह याद रखना जरूरी है कि भारत ने इस समझौते की कीमत अपने एक सच्चे और ईमानदार नेता लाल बहादुर शास्त्री को खोकर चुकाई थी। शास्त्री जी का नारा – “जय जवान, जय किसान” आज भी देशवासियों के दिलों में गूंजता है, और ताशकंद समझौता भारतीय इतिहास में हमेशा एक भावनात्मक अध्याय बना रहेगा।





