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Karur भगदड़ केस में तमिलनाडु सरकार को झटका, हाई कोर्ट ने रद्द किया नौकरी वाला आदेश

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Karur: तमिलनाडु सरकार को करूर भगदड़ मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को दया के आधार पर सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था। अदालत ने कहा कि इस तरह का फैसला संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और भविष्य में इसी प्रकार की अनेक मांगों का आधार बन सकता है।

Karur: करूर भगदड़ मामले में सरकार का आदेश हुआ रद्द

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने अपने फैसले में कहा कि तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी आदेश, जिसके तहत पिछले वर्ष सितंबर में करूर भगदड़ में मृतकों के परिजनों को ‘कम्पैशनेट अपॉइंटमेंट’ देने का प्रावधान किया गया था, कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की नियुक्तियां संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए।

Karur: अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला देते हुए कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने कहा कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 की भावना के विपरीत है। अदालत के अनुसार सरकारी नौकरियों में समान अवसर का सिद्धांत सर्वोपरि है और किसी विशेष घटना के आधार पर अलग व्यवस्था करना समानता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

Karur: पहले से लंबित हैं कई दया नियुक्ति के मामले

अदालत ने कहा कि राज्य के विभिन्न सरकारी विभागों में पहले से ही अनेक ऐसे परिवार हैं, जो दया के आधार पर नियुक्ति मिलने का वर्षों से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में केवल एक विशेष हादसे के पीड़ित परिवारों को प्राथमिकता देना उन लंबित मामलों के साथ न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

Karur: अनुच्छेद 162 के तहत सरकार की शक्तियों पर भी कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत कर सकती है, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल भी संवैधानिक सीमाओं और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के भीतर ही होना चाहिए। अदालत के अनुसार प्रशासनिक अधिकार असीमित नहीं हैं।

Karur: अदालत ने बताया क्यों बन सकता है गलत उदाहरण

हाई कोर्ट ने कहा कि यदि इस मामले में दया के आधार पर सरकारी नौकरी देने की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में अन्य दुर्घटनाओं के पीड़ित भी इसी प्रकार की मांग करने लगेंगे। इससे सरकार के सामने समान प्रकृति के अनेक मामलों में नौकरी देने का दबाव उत्पन्न हो सकता है।

Karur: अन्य हादसों का उदाहरण देकर समझाया फैसला

अदालत ने अपने आदेश में आतिशबाजी दुर्घटनाओं और सड़क हादसों जैसे मामलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि इन घटनाओं में भी कई बार सरकारी लापरवाही के आरोप लगे, लेकिन पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरी नहीं बल्कि आर्थिक सहायता या अनुग्रह राशि (Ex-Gratia) प्रदान की गई। इसलिए केवल करूर मामले में अलग व्यवस्था करना उचित नहीं माना जा सकता।

Karur: मुख्यमंत्री ने पहले सौंपे थे नियुक्ति पत्र

गौरतलब है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने जुलाई की शुरुआत में करूर का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने भगदड़ में जान गंवाने वाले 32 परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र सौंपे थे। हालांकि अब मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस आदेश की वैधता समाप्त हो गई है और आगे की कार्रवाई सरकार को न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप करनी होगी।

Karur: फैसले के दूरगामी असर पर नजर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में दया के आधार पर सरकारी नियुक्तियों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। अदालत ने अपने आदेश के जरिए स्पष्ट किया है कि संवेदनशील परिस्थितियों में भी सरकारी फैसलों को संविधान के मूल सिद्धांतों और समान अवसर की व्यवस्था के अनुरूप ही होना चाहिए।

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