Emergency 1975 : आपातकाल का सच, यदि वो कठोर कदम न उठता, तो क्या होता?

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Emergency 1975 : आपातकाल की पृष्ठभूमि और उस दौर की चुनौतियां

(डॉ संदीप सबलोक, अध्येता – राजनीति विज्ञान)

Emergency 1975 : इतिहास हमेशा विजेताओं या नैरेटिव बनाने वालों के हिसाब से नहीं, बल्कि परिस्थितियों के क्रूर सच के तराजू पर तौला जाना चाहिए। आज जब भी 1975 के आपातकाल की चर्चा होती, तो उसे राजनीति के एकतरफा चश्मे से ही देखा जाता है। लेकिन कोई भी जिम्मेदार नागरिक या राजनीतिक विश्लेषक जब उस दौर की पृष्ठभूमि में जाकर निष्पक्षता से सोचेगा, तो उसके सामने एक यक्ष प्रश्न जरूर खड़ा होगा—”यदि 25 जून 1975 को आपातकाल नहीं लगता, तो भारत का क्या होता? इसका सीधा और कड़वा सच यह है कि यदि उस समय वह असाधारण और कठोर संवैधानिक कदम नहीं उठाया जाता, तो भारत का लोकतंत्र कुछ अवसरवादी वैचारिक ताकतों के हाथों बंधक बन चुका होता और देश में ठीक वैसी ही अराजकता और अस्थिरता पैदा होती, जैसी हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में बार-बार तख्तापलट और राजनीतिक शून्यता के रूप में देखी जाती रही है। वास्तव में, विपक्षी दलों ने आपातकाल के नाम पर कांग्रेस को बदनाम करने के लिए जो दशकों लंबा दुष्प्रचार चलाया है, वह कुछ और नहीं बल्कि उस दौर में उनके द्वारा की गई देश विरोधी गतिविधियों और अपनी मुंह की कालिक को छुपाने का एक हताश प्रयास मात्र है।

Emergency 1975

Emergency 1975 : सुरक्षा बलों में बगावत और ‘पाकिस्तानी मॉडल’ का खतरा

आपातकाल लागू होने से ठीक एक दिन पहले, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान से विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने देश की सेना, पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से खुला आह्वान किया था कि वे सरकार के आदेशों को मानना बंद कर दें।
सोचिए, यदि देश के सुरक्षा बल राजनीतिक उकसावे में आकर बगावत कर देते, तो क्या होता?
संवैधानिक ढांचे का ढहना: जब सेना और पुलिस चुनी हुई सरकार के आदेशों की तामील करना बंद कर देती हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। तख्तापलट जैसी स्थितियां: इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में जब-जब नागरिक प्रशासन कमजोर हुआ या सेना को राजनीति में घसीटा गया, वहां लोकतंत्र का गला घोंटकर सैन्य तानाशाही स्थापित हो गई। यदि भारत में सुरक्षा बलों को भड़काने की वह कोशिश कामयाब हो जाती, तो भारत भी दशकों के लिए राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट के उसी दुष्चक्र में फंस जाता जिससे पाकिस्तान आज तक नहीं उबर पाया है। विपक्ष का आज का चिल्लाहट भरा प्रचार असल में सेना को भड़काने के इसी देश विरोधी कृत्य पर परदा डालने की कोशिश है।

Emergency 1975 : ‘भीड़तंत्र’ के हाथों चुनी हुई सरकारों का चीरहरण

1974-75 के दौरान गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार के छात्र आंदोलन के नाम पर जो कुछ हुआ, उसने भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को तार-तार कर दिया था। बंदूक की नोक पर इस्तीफे: सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन करके, विधायकों को बंधक बनाकर और उनके परिवारों को डरा-धमकाकर जबरन विधानसभाएं भंग करने का दबाव बनाया जा रहा था।
यदि सख्त कदम न उठता: तो सड़कों पर उतरने वाली हिंसक भीड़ यह तय करने लगती कि देश में कौन सी सरकार चलेगी और कौन सी नहीं। चुनाव और जनादेश का महत्व पूरी तरह खत्म हो जाता। हर छह महीने में देश के किसी न किसी कोने में उग्र भीड़ के दम पर चुनी हुई सरकारों को गिराने का एक खतरनाक सिलसिला शुरू हो जाता, जिससे देश कभी न संभलने वाली अराजकता की आग में झुलस जाता।

Emergency 1975 : देश की अर्थव्यवस्था और लाइफलाइन का पूरी तरह पंगु होना

मई 1974 में विपक्ष के समर्थन से हुई देशव्यापी रेलवे हड़ताल ने भारत की धमनियों को रोक दिया था। उग्र प्रदर्शनकारियों द्वारा जगह-जगह रेल की पटरियां उखाड़ी गईं और रेलवे स्टेशनों को फूंका गया।
रसद और सुरक्षा पर संकट: इस चक्का जाम के कारण सीमाओं पर तैनात सेना के लिए साजो-सामान का मूवमेंट, देश के कोने-कोने में अनाज की सप्लाई और जरूरी दवाओं की आपूर्ति पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच गई थी।
आर्थिक महाविनाश: यदि इस अराजकता को और ढील दी जाती, तो देश एक अभूतपूर्व आर्थिक मंदी, अकाल और आंतरिक ashes में धंस जाता, जिसका फायदा उठाने के लिए हमारी सीमाओं पर बैठे दुश्मन देश ताक में थे। देश की जीवन रेखा को इस तरह काटने वाले तत्व आज खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताकर इतिहास के सामने अपनी राष्ट्रविरोधी भूमिका को धोना चाहते हैं।

Emergency 1975 : शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की असुरक्षा और राजनीतिक हिंसा

अराजकता इस स्तर पर पहुंच चुकी थी कि देश के केंद्रीय रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की बम ब्लास्ट में सरेआम हत्या कर दी गई और उसके तुरंत बाद देश के मुख्य न्यायाधीश पर जानलेवा हमला हुआ। विपक्ष कानूनी और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का इंतजार करने के बजाय सीधे ‘सिविल नाफरमानी’ और हिंसा पर उतारू था।
अगर केंद्र सरकार उस समय मूकदर्शक बनी रहती, तो कार्यपालिका और न्यायपालिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग हिंसक तत्वों के आसान शिकार बन जाते। देश में पूरी तरह से कानून व्यवस्था का शासन समाप्त हो जाता और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की संस्कृति हावी हो जाती।

Emergency 1975 : “संविधान हत्या दिवस” का पाखंड और सीधे सवाल

आज जब भाजपा और उसकी सरकार राजनीतिक लाभ के लिए 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का स्वांग रचती है, तो वह न केवल इतिहास का मजाक उड़ाती है बल्कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के बनाए महान संविधान का भी घोर अपमान करती है। इस दुष्प्रचार पर दो टूक और सीधे सवाल खड़े होते हैं :


यदि 1975 में संविधान की हत्या हो गई थी, तो पिछले 51 सालों से यह देश किस आधार पर चल रहा है?
क्या इस देश की न्यायपालिका, संसद और चुनाव आयोग पिछले पांच दशकों से बिना संविधान के काम कर रहे हैं?


1977 में जनता पार्टी की सरकार किस संविधान के तहत बनी थी? आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किस संविधान की शपथ लेकर प्रधानमंत्री पद संभाला था? और खुद मौजूदा प्रधानमंत्री जी ने किस संविधान के सामने माथा टेककर सत्ता संभाली थी?

सच्चाई यह है कि भारत का संविधान अमर और जीवंत है। 1975 में उठाया गया कदम इसी संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत पूरी तरह कानूनी और संवैधानिक था। संविधान की गरिमा तब भी बची रही, क्योंकि उसी संविधान के नियमों के तहत 1977 में चुनाव हुए और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हुआ। संविधान की ‘हत्या’ की बात कहना हमारे संवैधानिक ढांचे की ताकत का अपमान करना है।

Emergency 1975 : गलतियों की स्वीकारोक्ति, लोकतंत्र का दंड और ऐतिहासिक वापसी

हम इस ऐतिहासिक सच से भी मुंह नहीं मोड़ते कि आपातकाल के दौरान देश में कुछ जगहों पर अति-उत्साही नौकरशाही द्वारा आम जनता और कई लोगों के साथ ज्यादतियां भी हुईं। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती देखिए कि जब देश में चुनाव हुए, तो जनता ने उस ज्यादती का कड़ा संज्ञान लिया। आदरणीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी की कांग्रेस सरकार को 1977 में सत्ता से बेदखल होना पड़ा और पार्टी ने जनता के उस फैसले और दंड को सहर्ष, पूरी विनम्रता के साथ स्वीकार किया।
लेकिन इतिहास का सबसे बड़ा न्याय और सच अभी बाकी था! जनता पार्टी की सरकार ने जिस तरह देश को राजनीतिक नौटंकी और दिशाहीनता की ओर धकेला, उससे देश को समझ आ गया कि मजबूत नेतृत्व का कोई विकल्प नहीं है। जनता का वह दंड भी ज्यादा समय तक नहीं रहा। महज 3 साल के भीतर, 1980 के आम चुनाव में देश की जनता ने विपक्ष के सारे झूठे प्रचारों को खारिज करते हुए भारी बहुमत के साथ पुनः इंदिरा गांधी और कांग्रेस पार्टी को सत्ता की कमान सौंप दी। 1980 का वह प्रचंड जनादेश इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि देश की जनता ने यह मान लिया था कि 1975 का आपातकाल देश को टूटने से बचाने के लिए एक अनिवार्य ऐतिहासिक आवश्यकता थी।

Emergency 1975 : अघोषित आपातकाल के पाप को छुपाने का पैंतरा

आपातकाल कोई शौक या तानाशाही की चाहत नहीं थी, बल्कि देश की आंतरिक संप्रभुता को बचाने के लिए उठाया गया एक कड़ा और अनिवार्य संवैधानिक कदम था। आज विपक्ष और विशेषकर सत्ताधारी दल द्वारा आपातकाल को लेकर जो इतना प्रचार किया जाता है, वह वास्तव में लोकतंत्र के प्रति उनकी चिंता नहीं है। यह तो वर्तमान दौर में उनके द्वारा थोपे गए ‘अघोषित आपातकाल’ (Undeclared Emergency) के अपने ऐतिहासिक पाप पर पर्दा डालने की कोशिश है—जहां बिना किसी घोषित नियम के विपक्षी मुख्यमंत्रियों को जेल में डाल दिया जाता है, चुनी हुई सरकारों को धनबल और जांच एजेंसियों (ED/CBI) के दम पर रातों-रात गिरा दिया जाता है, और संसद से सैकड़ों सांसदों को सस्पेंड करके तानाशाही चलाई जाती है।
आपातकाल का असली सच यही है कि उसने देश को उन स्वार्थी ताकतों के हाथों बिखरने और ‘पाकिस्तानी रास्ते’ पर जाने से बचा लिया, जो केवल सत्ता हथियाने के लिए पूरे राष्ट्र को दांव पर लगाने के लिए तैयार बैठी थीं। जो लोग हर रोज बाबासाहेब के संविधान की आत्मा को चोट पहुंचाते हैं, वे कैलेंडर पर तारीखें बदलकर देश को गुमराह करना बंद करें।

   ( लेखक राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन विषय के अध्येता एवं शिक्षाशास्त्री/ प्राध्यापक हैं)

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