Chaiti Chhath 2026: 22 मार्च से शुरू होगा महापर्व, जानें नहाय-खाय से पारण तक पूरा अनुष्ठान

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Chaiti Chhath 2026

Chaiti Chhath 2026: सनातन परंपरा में हर पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का भी संदेश देता है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला चैती छठ इसी आस्था का महत्वपूर्ण पर्व है। धर्म ग्रंथों के अनुसार चैत्र मास को सृष्टि की शुरुआत का समय माना गया है, इसलिए यह काल नई ऊर्जा और नए संकल्प का प्रतीक होता है।

Chaiti Chhath 2026: 22 मार्च से शुरू होगा चार दिवसीय अनुष्ठान

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष चैती छठ का आरंभ 22 मार्च 2026, यानी कल (रविवार) को नहाय-खाय के साथ होगा। इस दिन से चार दिनों तक चलने वाला यह व्रत पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाता है। सूर्योपासना की यह परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है, जिसमें अस्त होते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है।

Chaiti Chhath 2026: षष्ठी देवी और सूर्य उपासना का महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार षष्ठी देवी को संतान की रक्षा और समृद्धि की देवी माना जाता है। वहीं सूर्य देव को सृष्टि का आधार माना गया है। छठ महापर्व में इन दोनों की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

नहाय-खाय से शुरू होती है पूजा

पहले दिन यानी 22 मार्च को व्रती गंगा या पवित्र जल में स्नान कर भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। इसके बाद प्रसाद के रूप में अरवा चावल, कद्दू की सब्जी और चने की दाल ग्रहण की जाती है।

Chaiti Chhath 2026: खरना और निर्जला व्रत की शुरुआत

दूसरे दिन 23 मार्च को व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को खरना पूजा करते हैं। इस दिन गुड़, दूध और चावल से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। खरना के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

Chaiti Chhath 2026: अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अर्घ्य

तीसरे दिन 24 मार्च को शाम के समय अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद चौथे दिन 25 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है, जिसे पारण कहा जाता है।

Chaiti Chhath 2026: चार दिनों का पूरा कार्यक्रम

22 मार्च (रविवार): नहाय-खाय
23 मार्च (सोमवार): खरना
24 मार्च (मंगलवार): सायंकालीन अर्घ्य
25 मार्च (बुधवार): उदीयमान सूर्य को अर्घ्य और पारण
अनुशासन और प्रकृति संरक्षण का संदेश

छठ महापर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। यह पर्व व्यक्ति को आध्यात्मिक संतुलन और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सिखाता है।

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