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वंदे मातरम की 150वीं जयंती: मौलाना की विवादित तकरीर ‘राष्ट्रगीत’ पर मुस्लिमों को भड़काया !, SC पर भी उठाए सवाल

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by: vijay nandan

भोपाल: जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान विवादित बयान दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “मुर्दा कौम मुश्किलों में नहीं पड़ती, वह सरेंडर कर देती हैं, उसे ‘वंदे मातरम’ पढ़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत पढ़ना शुरू कर देंगी। यही ‘मुर्दा कौम’ की पहचान है। यदि ‘जिंदा कौम’ है तो उसका हौसला बढ़ाना होगा और हालात का सामना करना होगा। उन्होंने आगे सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट तब तक ही सुप्रीम कहलाने का हकदार है जब तक कि वह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। यदि वह ऐसा न करे तो फिर वह ‘सुप्रीम’ कहलाने का हकदार नहीं है।

मौलाना मदनी ने मुस्लिमों से जुड़े कई मुद्दों पर सर्वोच्य अदालत के फैसलों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद का फैसला हो या तीन तलाक का, इन फैसलों के बाद ऐसा लग रहा है कि अदालतें सरकार के दबाव में काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों के हनन की ऐसी मिसालें सामने आई हैं, जिन्होंने अदालतों के किरदार पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

कार्यक्रम का माहौल और प्रतिक्रियाएँ

कार्यक्रम में मौजूद धार्मिक प्रतिनिधियों और समर्थकों ने उनके बयान पर ताली बजाकर सहमति जताई, जबकि कुछ राजनीतिक व सामाजिक समूहों ने इसे अनावश्यक उकसावे वाला बताया। विरोधी पक्ष का कहना है कि ऐसी बयानबाजी सामुदायिक विभाजन को बढ़ावा देती है, जबकि समर्थक इसे आत्मसम्मान और अधिकारों का संदेश मानते हैं।

वंदे मातरम’ का संदर्भ में फिर उठे पुराने सवाल

मौलाना मदनी ने सीधे तौर पर ‘वंदे मातरम’ का उदाहरण देते हुए कहा कि “दूसरों के दबाव में किसी भी समुदाय से उसकी आस्था के खिलाफ कुछ करवाना मानवता और स्वतंत्रता की भावना के खिलाफ है। यह बयान उसी पुरानी बहस को फिर से सामने लाता है कि देशभक्ति की अभिव्यक्ति का तरीका क्या होना चाहिए, और क्या उसे बाध्य किया जा सकता है?

मौलाना मदनी का बयान केवल धार्मिक पहचान की बहस नहीं है, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान, राजनीतिक दबाव और सामुदायिक आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा है। भोपाल में दिया गया यह वक्तव्य आने वाले दिनों में राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया में विवाद का केंद्र बना रह सकता है।

संपादक की नजर से…

मौलाना महमूद मदनी की तकरीर के निहितार्थ इस बात पर केंद्रित हैं कि किसी भी समुदाय को अपने धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वासों से समझौता करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। ‘मुर्दा कौम’ और ‘जिंदा कौम’ का उनका रूपक मनोबल, आत्मसम्मान और सामुदायिक अधिकारों का प्रतीक बनता है। हालांकि, सार्वजनिक मंच से ऐसी अभिव्यक्ति समाज में विभाजन और संवेदनशील मुद्दों के राजनीतिकरण को भी बढ़ा सकती है। लोकतंत्र में विविधता का सम्मान जरूरी है, किंतु किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक पर टकराव पैदा करने वाली भाषा न तो सहअस्तित्व को बढ़ाती है और न ही संवाद की संस्कृति को। मौलाना का इस तरह की तकरीर करने का मकसद जो भी रहा हो लेकिन राष्ट्रवाद के एजेंडे को बढ़ावा देने वाली ताकतों को बोलने का मौका जरूर मिल गया है। साथ ही उन देश विरोधी प्रोपगैंड़ा गैंग को भी उकसाने का, जो राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत नहीं गाने और नारे नहीं लगाने की वकालत करते हैं। ये तकरीर ये भी बताती है कि मौलाना मदनी ने अपने पुराने विचारों के विपरीत जाकर राष्ट्र के प्रतीकों के खिलाफ जाकर बयान दिया है।

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