पुतिन की अगली चाल: मोल्डोवा, बाल्टिक या कजाकिस्तान? एक्सपर्ट एनालिसिस

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यूरोप तीसरा विश्व युद्ध

जरा सोचिए, सुबह उठते ही आपको न्यूज़ अलर्ट मिले — रूस ने पूर्वी यूरोप पर धावा बोल दिया है। टैंकों की गड़गड़ाहट, मिसाइलों की बारिश और शहरों में अफरातफरी। जो लोग सोच रहे थे कि यूक्रेन जंग का आखिरी पड़ाव है, वो गलत साबित हो रहे हैं। असल में, यूक्रेन सिर्फ शुरुआत है।

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक खतरनाक लेकिन रणनीतिक प्लान पर वर्षों से काम कर रहे हैं। सवाल उठता है — उनका अगला कदम क्या होगा? क्या NATO इसे रोक पाएगा? या यूरोप इतिहास की सबसे बड़ी जियोपॉलिटिकल जंग की ओर बढ़ रहा है?

यूक्रेन जंग: सिर्फ एक ट्रेलर

चार साल हो चुके हैं लेकिन यूक्रेन युद्ध का कोई अंत नजर नहीं आ रहा। खुफिया रिपोर्ट्स मानती हैं कि यह जंग 2026 तक खिंच सकती है। रूस का मकसद साफ है — यूक्रेन की सरकार को अस्थिर करना और पश्चिमी प्रभाव को खत्म करना।

रूस यूक्रेन को सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि NATO और रूस के बीच का ‘बफर ज़ोन’ मानता है। पुतिन जानते हैं कि अगर यूक्रेन NATO में शामिल हुआ, तो रूस की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। यही वजह है कि यह युद्ध जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है।

मोल्डोवा: पुतिन की नजर में अगला शिकार

यूक्रेन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से अहम देश — मोल्डोवा। अगर रूस यहां प्रभाव बढ़ाता है, तो वह सीधे NATO के सदस्य देश रोमानिया की सीमा तक पहुंच सकता है।

मोल्डोवा पहले से ही राजनीतिक रूप से बंटा हुआ और कमजोर रक्षा तंत्र वाला देश है। वहां ट्रांसनिस्ट्रिया नामक विवादित क्षेत्र में 1990 से रूसी सैनिक तैनात हैं। यही सैनिक मोल्डोवा में सैन्य कार्रवाई का रास्ता आसान बना सकते हैं।

अगर मोल्डोवा पर कब्जा हुआ तो…

  • यूक्रेन तीन तरफ से घिर जाएगा: उत्तर में बेलारूस, पूर्व में रूस, दक्षिण-पश्चिम में मोल्डोवा।
  • पश्चिम से आने वाली सैन्य और मानवीय सहायता रुक जाएगी।
  • NATO की स्थिति और कमजोर हो जाएगी।

बाल्टिक देश: यूरोप का सबसे कमजोर लिंक

एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया — छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से अहम देश। ये तीनों NATO में शामिल हैं लेकिन इनकी सीमाएं रूस से सटी हुई हैं। इन देशों में रूसी भाषी आबादी मौजूद है, जिसे पुतिन यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र जैसी स्थिति बनाने के बहाने के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

अगर पुतिन ने इन देशों पर हमला किया, तो NATO का सबसे बड़ा नियम ‘आर्टिकल 5’ लागू हो सकता है — एक देश पर हमला, पूरे गठबंधन पर हमला माना जाएगा।

लेकिन बड़ा सवाल यह है — क्या NATO अंदर से एकजुट रहेगा? क्योंकि पिछले कुछ सालों में NATO में गंभीर मतभेद सामने आए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने खुलेआम संगठन की आलोचना की है और यूरोपीय देशों पर निर्भरता का आरोप लगाया है।

अगर NATO कमजोर पड़ा, तो पुतिन बिना एक भी गोली चलाए, संगठन को तोड़ सकते हैं — यही उनकी सबसे बड़ी जियोपॉलिटिकल जीत होगी।

जॉर्जिया: यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट का गेटवे

जॉर्जिया, जो अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, रूस की योजना में अहम रोल निभा सकता है। 2008 में रूस ने इस देश के दो हिस्सों पर कब्जा कर लिया था और आज भी वहां रूसी सैनिक मौजूद हैं।

जॉर्जिया से होकर गुजरने वाली एनर्जी पाइपलाइंस यूरोप को रूसी तेल-गैस पर निर्भर होने से बचाती हैं। अगर रूस ने जॉर्जिया पर पूरा नियंत्रण पा लिया, तो यूरोप एक बार फिर ऊर्जा संकट में फंस सकता है।

कजाकिस्तान: रूस की पकड़ से फिसलता साथी

सेंट्रल एशिया का सबसे बड़ा देश — कजाकिस्तान। तेल, गैस, यूरेनियम और दुर्लभ खनिजों से भरपूर। लेकिन यह देश धीरे-धीरे रूस से दूर और चीन, तुर्की, अमेरिका की ओर झुक रहा है।

कजाकिस्तान अब NATO और अमेरिका के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है। यही बदलाव पुतिन के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। रूस हर हाल में चाहता है कि कजाकिस्तान उसके प्रभाव में रहे, चाहे इसके लिए सैन्य हस्तक्षेप क्यों न करना पड़े।

आर्कटिक: नई वैश्विक जंग का केंद्र

जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्कटिक में बर्फ तेजी से पिघल रही है। इसके कारण नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो व्यापार के नक्शे को बदल सकते हैं।

रूस पहले ही:

  • आर्कटिक में 50 से ज्यादा सैन्य ठिकाने बना चुका है।
  • 40 से ज्यादा आइस ब्रेकर शिप्स उसके पास हैं।
  • अत्याधुनिक रेडार सिस्टम और न्यूक्लियर सबमरींस तैनात हैं।

इसके जवाब में अमेरिका भी अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है लेकिन वह रूस से काफी पीछे है। अगर NATO कमजोर पड़ा, तो रूस आर्कटिक पर पूरा कब्जा जमा सकता है, जिससे वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा।

रूस का नया गेम: लिथियम पर दांव

तेल-गैस से आगे बढ़कर पुतिन की नजर अब लिथियम पर है। ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की रीढ़ बनने वाले इस मिनरल के जरिए रूस:

  • 2030 तक हर साल 60,000 टन लिथियम उत्पादन का लक्ष्य रखता है।
  • ग्लोबल EV इंडस्ट्री में दबदबा कायम करना चाहता है।
  • पश्चिमी देशों की आर्थिक पाबंदियों का असर कम करना चाहता है।

रूस-चीन-ईरान गठजोड़: अमेरिका के खिलाफ नया फ्रंट

रूस ने चीन और ईरान के साथ मजबूत रणनीतिक गठजोड़ बना लिया है। दोनों देशों का साझा लक्ष्य है — अमेरिकी वर्चस्व को खत्म करना।

  • रूस चीन को सस्ती दर पर तेल और गैस दे रहा है।
  • आपसी व्यापार 200 अरब डॉलर पार कर चुका है।
  • डॉलर की जगह स्थानीय करेंसी में व्यापार बढ़ाया जा रहा है।

यह सिर्फ आर्थिक चाल नहीं बल्कि एक बड़ा जियोस्ट्रेटेजिक मास्टरस्ट्रोक है।


निष्कर्ष: क्या पुतिन नया वर्ल्ड ऑर्डर लिखने में कामयाब होंगे?

NATO अंदरूनी मतभेदों से जूझ रहा है। यूरोप रणनीतिक रूप से कमजोर पड़ रहा है। रूस सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक तीनों मोर्चों पर आक्रामकता दिखा रहा है।

आने वाले कुछ साल तय करेंगे:

✅ क्या यूरोप एकजुट रहेगा?
✅ क्या पश्चिमी देश पुतिन की चालों को रोक पाएंगे?
✅ या फिर रूस एक नया बहु-ध्रुवीय (Multipolar) वर्ल्ड ऑर्डर कायम कर देगा?

दुनिया एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है। फैसले अब नहीं लिए गए, तो इतिहास खुद को एक और खतरनाक रूप में दोहरा सकता है।

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