Ram Nam Par Loot : कहते हैं, भगवान सब देखते हैं। लेकिन आजकल लगता है कि भगवान भी सीसीटीवी फुटेज देखने का इंतजार कर रहे हैं। श्रद्धालु श्रद्धा से चढ़ावा चढ़ाते हैं, पुजारी पूजा कराते हैं, ट्रस्ट हिसाब-किताब रखता है और फिर अचानक खबर आती है कि दान में आई कुछ वस्तुएं गायब हैं। अब सवाल यह नहीं कि वस्तु कहां गई, सवाल यह है कि आस्था की जेब किसने टटोली?
हमारा देश बड़ा अद्भुत है। यहां दान देने वाला कभी रसीद नहीं मांगता और दान लेने वाले को कभी हिसाब देने की जल्दी नहीं होती। दानपेटी लोकतंत्र की तरह है—हर कोई उसमें अपना विश्वास डालता है, लेकिन बाहर क्या निकलता है, यह कुछ चुनिंदा लोगों को ही पता होता है।

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राम के नाम पर लोग सोना, चांदी, नकदी, गहने और अपनी भावनाएं तक अर्पित कर देते हैं। किसी ने बेटी की शादी की मनौती पूरी होने पर हार चढ़ाया, किसी ने बेटे की नौकरी लगने पर सोने का मुकुट। किसी ने अपनी पहली कमाई का हिस्सा चढ़ाया तो किसी ने बुजुर्ग मां की आखिरी इच्छा पूरी की। लेकिन यदि यही चढ़ावा रास्ते में ही “मोक्ष” पा जाए, तो श्रद्धालु सोचता है कि भगवान तक पहुंचने का रास्ता आखिर इतना टेढ़ा क्यों है?
Ram Nam Par Loot : आजकल चोरी भी बड़ी आधुनिक हो गई है। पहले चोर रात के अंधेरे में आते थे, अब वे व्यवस्था की रोशनी में भी आराम से घूम लेते हैं। पहले दीवार फांदनी पड़ती थी, अब फाइलें काफी होती हैं। पहले ताला तोड़ना पड़ता था, अब भरोसा टूटता है। तकनीक बदल गई है, लेकिन नीयत का सॉफ्टवेयर अब भी अपडेट नहीं हुआ।
कुछ लोग कहते हैं, “भगवान को क्या जरूरत है सोने-चांदी की?” बात बिल्कुल सही है। भगवान को सचमुच जरूरत नहीं है। लेकिन भगवान के नाम पर चढ़ाए गए दान की जरूरत उन श्रद्धालुओं के विश्वास को होती है, जिन्होंने उसे आस्था का प्रतीक मानकर अर्पित किया। चोरी सोने की नहीं होती, चोरी भरोसे की होती है। और भरोसे की एफआईआर किसी थाने में दर्ज नहीं होती।
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Ram Nam Par Loot : हर बार जांच समिति बनती है। समिति जांच करती है कि जांच की जरूरत है या नहीं। फिर दूसरी समिति तय करती है कि पहली समिति ने ठीक जांच की या नहीं। अंत में प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और बताया जाता है कि “सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी है।” जनता भी मुस्कुरा देती है, क्योंकि उसे मालूम है कि पारदर्शिता का मतलब अब अक्सर इतना ही रह गया है कि अंदर क्या हो रहा है, वह साफ दिखाई नहीं देता।
Ram Nam Par Loot : हमारे यहां एक कहावत है—”राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।” संतों ने इसका अर्थ आध्यात्मिक रखा था कि प्रभु के नाम का जितना लाभ लेना हो, ले लो। लेकिन कुछ लोगों ने इसका प्रशासनिक संस्करण तैयार कर लिया। उन्होंने सोचा कि जब नाम राम का है तो माल भी शायद राम भरोसे ही होगा।
सबसे रोचक दृश्य तब होता है जब हर पक्ष खुद को सबसे बड़ा भक्त घोषित करने में लग जाता है। कोई कहता है, “हमारे रहते ऐसा कैसे हो सकता है?” दूसरा कहता है, “इसीलिए तो हुआ।” तीसरा कहता है, “जांच होने दीजिए।” चौथा कहता है, “जांच की भी जांच होनी चाहिए।” और इस बहस में असली मुद्दा—दान की सुरक्षा—कहीं पीछे छूट जाता है।
रामायण में शबरी ने बेर चढ़ाए थे। उनकी कीमत बाजार में नहीं, भावना में थी। निषादराज ने मित्रता दी थी, वह किसी खजाने में नहीं तौली गई। गिलहरी ने रेत के कण दिए थे, उन्हें किसी इन्वेंट्री रजिस्टर में दर्ज नहीं किया गया। राम ने दान का मूल्य कभी धातु से नहीं, भावना से आंका। इसलिए यदि आज किसी मंदिर के चढ़ावे पर सवाल उठते हैं, तो चिंता सोने की नहीं, उस भावना की होनी चाहिए जो करोड़ों लोगों को मंदिर तक लेकर आती है।
मंदिर केवल पत्थरों का भवन नहीं होता, वह विश्वास का घर होता है। और विश्वास की रक्षा ताले, कैमरे या गार्ड से नहीं, ईमानदारी से होती है। यदि दानपेटी की रक्षा केवल लोहे की चाबी से होगी और चरित्र की चाबी कहीं खो जाएगी, तो फिर सबसे बड़ा नुकसान किसी ट्रस्ट, सरकार या संस्था का नहीं, समाज की आस्था का होगा।
आखिर राम का नाम जोड़ना आसान है, लेकिन राम जैसा आचरण निभाना ही सबसे कठिन परीक्षा है। यही परीक्षा हर उस व्यक्ति की है, जिसके हाथों में श्रद्धालुओं की आस्था की अमानत सौंपी जाती है।

