प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा ऐसे समय पर हो रही है जब तुर्की ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया है। यह यात्रा न केवल G7 समिट (कनाडा) में भाग लेने के रास्ते में है, बल्कि वापसी पर क्रोएशिया की यात्रा भी इसमें शामिल है।
यह साइप्रस की अब तक की तीसरी भारतीय प्रधानमंत्री स्तर की यात्रा होगी — इससे पहले 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी और 1983 में इंदिरा गांधी यहां जा चुकी हैं। यह दौरा भारत के रणनीतिक उद्देश्यों की पुष्टि करता है, खासकर ऐसे देशों के साथ मजबूत संबंध बनाने की जो आतंकवाद और वैश्विक मुद्दों पर भारत के पक्ष में खड़े रहे हैं।
🔷 साइप्रस क्यों? और इस समय क्यों?
साइप्रस की यात्रा कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह तुर्की की पाकिस्तान समर्थक नीति के जवाब में भारत की एक रणनीतिक चाल मानी जा रही है। हाल ही में भारत-पाकिस्तान सैन्य तनाव के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोआन ने पाकिस्तान का खुला समर्थन किया था।
🔸 प्रमुख कारण:
- 2026 की पहली छमाही में साइप्रस यूरोपीय संघ परिषद (EU Council) का अध्यक्ष बनने जा रहा है।
- इससे भारत को EU में अपने प्रभाव को और मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
- भारत और साइप्रस के बीच रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
- भारत को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साइप्रस का समर्थन मिला है, जैसे:
- UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में भारत की सदस्यता
- भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट
- एनएसजी (NSG) सदस्यता
- 1998 के भारत परमाणु परीक्षणों पर समर्थन
🔷 G7 समिट 2025: भारत की भूमिका
G7 शिखर सम्मेलन 15-17 जून को कनाडा के अल्बर्टा (Kananaskis) में हो रहा है। पीएम मोदी 17 जून को आउटरीच सेशन में हिस्सा लेंगे। यह निमंत्रण आखिरी समय में आया है, इसलिए कार्यक्रम अभी तय हो रहा है, लेकिन कई द्विपक्षीय मुलाकातें प्रस्तावित हैं।
🔸 भारत के लिए अवसर:
- वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और तकनीकी नवाचार पर चर्चा
- ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुख मंचों तक पहुंचाना
- जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति श्रृंखला स्थिरता जैसे मुद्दों पर भूमिका बढ़ाना
🔷 तुर्की बनाम भारत: साइप्रस पर टकराव की पृष्ठभूमि
1974 में तुर्की द्वारा साइप्रस के उत्तरी भाग पर कब्जा कर एक अलग ‘Northern Cyprus’ गणराज्य की मान्यता देना, साइप्रस-तुर्की तनाव का कारण बना रहा है।
भारत हमेशा से इस मुद्दे के शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत समाधान का समर्थन करता रहा है।
इस यात्रा से भारत:
- अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाएगा
- तुर्की को परोक्ष संदेश देगा
- यूरोपीय संघ के सहयोगी देशों से संबंध और प्रगाढ़ करेगा
🔷 क्रोएशिया यात्रा: एक नया अध्याय
वापसी में प्रधानमंत्री मोदी क्रोएशिया की यात्रा भी करेंगे। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली आधिकारिक क्रोएशिया यात्रा होगी। यह भारत के लिए दक्षिण और मध्य यूरोप में अपनी कूटनीतिक पहुंच बढ़ाने का संकेत है।
🔸 भारत-क्रोएशिया संबंध:
- 2021 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर क्रोएशिया का दौरा कर चुके हैं।
- 2023 में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग समझौता (MoU) पर हस्ताक्षर हुए थे।
- तकनीक, रक्षा और व्यापार में सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
🔷 मोदी की यूरोप यात्रा: रणनीतिक संदेश और संतुलन
यह यात्रा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि:
- तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ के खिलाफ रणनीतिक जवाब
- छोटे लेकिन प्रभावशाली EU देशों के साथ मजबूत भागीदारी
- आतंकवाद, वैश्विक शांति और आर्थिक स्थिरता के मोर्चे पर नए सहयोग
🔷 निष्कर्ष: वैश्विक संतुलन की ओर भारत की चतुर चाल
जहां तुर्की ने पाकिस्तान के साथ खुली एकता दिखाई है, वहीं भारत उन देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है जो वैश्विक मंचों पर उसके साथ खड़े हैं। पीएम मोदी की साइप्रस और क्रोएशिया यात्रा भारत की सक्रिय और बहुपक्षीय कूटनीति का प्रमाण है। यह न केवल यूरोप में भारत की भूमिका को मजबूत करेगी, बल्कि आने वाले वर्षों में आर्थिक और सामरिक सहयोग के नए रास्ते भी खोलेगी।
Also Read: रूस-यूक्रेन युद्ध: कीव और ओडेसा पर मिसाइल और ड्रोन से बड़ा हमला, 3 की मौत, 13 घायल





