Parliament Monsoon Session : अमित शाह को सदन में बुलाने की मांग, तेज हुआ घमासान,सदन चलाना पक्ष-विपक्ष की साझा जिम्मेदारी
Parliament Monsoon Session : संसद के मॉनसून सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे टकराव के चलते भारी हंगामा जारी है, जिससे लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हो रही है और कामकाज ठप सा नजर आ रहा है। जिसके चलते महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पा रही है,सवाल यहाँ सिर्फ सदन में गतिरोध का नहीं है लेकिन आर्थिक रूप से भी भार बढ़ रहा है | संसद में लगातार हो रहे हंगामे और हंगामे की वजह से कार्यवाही बार-बार स्थगित होने से देश के करोड़ों रुपये पानी में जा रहे हैं। सरकारी और आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, संसद की कार्यवाही का एक मिनट चलाने का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये आता है, जिसमें सुरक्षा, स्टाफ, बुनियादी ढांचा और सांसदों के भत्ते शामिल हैं। सदन की जिम्मेदारी पक्ष और विपक्ष दोनों की होती है कि जनहित से जुड़े मुद्दे पर सार्थक चर्चा हो..बावजूद इसके गतिरोध हो रहा है तो जिम्मेदार कौन है ? इसी पर विस्तार से करेंगे चर्चा उससे पहले देखिये ये रिपोर्ट |
Parliament Monsoon Session : संसद में लगातार हो रहे हंगामे और हंगामे की वजह से कार्यवाही बार-बार स्थगित होने से देश के करोड़ों रुपये पानी में जा रहे हैं। सरकारी और आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, संसद की कार्यवाही का एक मिनट चलाने का खर्च लगभग 2.5 लाख रुपये आता है, जिसमें सुरक्षा, स्टाफ, बुनियादी ढांचा और सांसदों के भत्ते शामिल हैं। जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा के बजाय पहले दिन से ही हंगामा जारी है जिसके चलते सदन की कार्रवाई बार बार स्थगित करना पड़ता है | ऐसे में सवाल कि जिम्मेदार कौन ? इस सवाल का जवाब सीधे देश के करोड़ों करदाताओं से जुड़ा है। संसद का संचालन केवल सांसदों की मौजूदगी तक सीमित नहीं होता। इसके लिए सुरक्षा, सचिवालय, अनुवाद, रिपोर्टिंग, तकनीकी सेवाओं, प्रसारण, कर्मचारियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर हर दिन करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। बजट सत्र 2026 के दौरान लोकसभा में पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने सदन में कहा था कि संसद की कार्यवाही पर हर मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये, हर घंटे करीब 1.5 करोड़ रुपये और एक दिन में लगभग 9 करोड़ रुपये का खर्च आता है। संसद नहीं चलने का मतलब सिर्फ आर्थिक खर्च नहीं है। इससे कई संवैधानिक जिम्मेदारियां भी प्रभावित होती हैं।
Parliament Monsoon Session : संसदीय परंपरा कहती है कि सदन चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की साझा जिम्मेदारी है। सरकार को चर्चा के लिए माहौल बनाना होता है जबकि विपक्ष को विरोध के साथ-साथ बहस में भी हिस्सा लेना होता है। जब दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहते हैं तो सबसे बड़ा नुकसान जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं का होता है। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है लेकिन संसद का उद्देश्य केवल विरोध नहीं बल्कि समाधान भी है। लगातार बढ़ते विरोध से करोड़ों रुपये की संचालन लागत तो लगी ही, साथ ही कानून निर्माण, जवाबदेही और जनहित के मुद्दों पर चर्चा भी प्रभावित हुई। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि करोड़ो रुपये खर्च हुए बल्कि यह भी है कि देश को इसके बदले मिला क्या?
Parliament Monsoon Session : मॉनसूत्र सत्र के बीच आज भी लोकसभा में फिर से हंगामा देखने को मिला…पेलेट गन इस्तेमाल मामले को लेकर विपक्ष लगातार संसद में गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहा है. इस पर किरेन रिजिजू ने कहा कि कौन जवाब देगा ये विपक्ष तय नहीं करेगा. विपक्ष ने होम मिनिस्टर सदन में आओ के नारे लगाए. इनके चलते सोमवार तक के लिए लोकसभा स्थगित कर दी गई है. रिजिजू ने कहा कि गृह मंत्री बोलेंगे तो विपक्ष सुन नहीं पाएगा. अमित शाह सुबह सुबह संसद भवन आते हैं, देर रात वापस जाते हैं. ये नारा लगाने का तरीका गलत है. उन्होंने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह वो इंसान हैं, जिनका नाम सुनकर आतंकवादी, उग्रवादी कांप उठते हैं, जिस दिन अमित शाह का यहां जवाब होगा, आप सुन नहीं पाएंगे. कुछ ऐसा ही नजारा राज्यसभा में भी देखने को मिला, जहां चंदा चोर, गद्दी छोड़ के नारे लगाए गए. इसके बाद जमकर हंगामा हुआ.बहरहाल सदन में तकरार जारी है, और इंतजार एक सार्थक चर्चा का है ताकि सभी विषयों पर ठीक से चर्चा हो पाए और जनहित के मुद्दों पर कोई बेहतर निर्णय लिया जा सके | लेकिन सदन के अंदर का हंगामा सार्थक चर्चा के लिए फिलहाल दूर की कौड़ी साबित होता नजर आ रहा है

