BY
Yoganand Shrivastava
New Delhi दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि वे अब उनकी अदालत में चल रही सुनवाई का हिस्सा नहीं बनेंगे। केजरीवाल ने कहा कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद खत्म हो चुकी है, इसलिए न तो वे व्यक्तिगत रूप से और न ही उनके वकील इस मामले की सुनवाई में पेश होंगे।

New Delhi “अंतरात्मा की आवाज” और सत्याग्रह का हवाला
अरविंद केजरीवाल ने अपनी चिट्ठी में इस फैसले को ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ से जोड़ा है। उन्होंने पत्र में लिखा:

- अंतरात्मा की आवाज: उन्होंने अपनी अंतरात्मा की पुकार पर अदालत की कार्यवाही में भाग न लेने का निर्णय लिया है।
- सुप्रीम कोर्ट का विकल्प: केजरीवाल ने साफ किया कि जस्टिस स्वर्णकांता जो भी फैसला सुनाएंगी, वे उसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) में अपील करने के अपने अधिकार का उपयोग करेंगे।
New Delhi न्यायाधीश को हटाने की मांग हुई थी खारिज
यह विवाद तब और गहरा गया जब जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग करने (Recusal) की याचिका को खारिज कर दिया। केजरीवाल और अन्य ‘आप’ नेताओं (मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक) ने न्यायाधीश पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए आपत्ति जताई थी। उनकी दलील थी कि:

- न्यायाधीश ने पहले भी केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका और अन्य आरोपियों (मनीष सिसोदिया, के. कविता) की जमानत याचिकाओं पर राहत देने से इनकार कर दिया था।
New Delhi अदालत का कड़ा रुख: “न्यायाधीश पर हमला संस्था पर हमला”
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सुनवाई से हटने से इनकार करते हुए कहा कि किसी भी वादी को बिना किसी ठोस सबूत के न्यायाधीश के बारे में निर्णय लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उनके प्रमुख बिंदु थे:
- निराधार डर: न्यायाधीश किसी वादी के मन में बैठे निराधार डर या पूर्वाग्रह के कारण खुद को मामले से अलग नहीं कर सकते।
- संस्था की गरिमा: उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश पर व्यक्तिगत हमला वास्तव में न्यायपालिका पर हमला है। अदालत और संस्था की गरिमा के लिए वे इस मामले की सुनवाई जारी रखेंगी।
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