माँ बनी हैवान: औरैया की अदालत ने सुनाया फांसी का फरमान, तीन मासूमों को नदी में फेंककर ली थी जान

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BY: Yoganand Shrivastva

औरैया, उत्तर प्रदेश। जहाँ एक माँ की गोद सबसे सुरक्षित मानी जाती है, वहीं उत्तर प्रदेश के औरैया जिले से एक ऐसी दिल दहला देने वाली घटना सामने आई जिसने इंसानियत को झकझोर दिया। एक माँ ने अपने ही तीन मासूम बच्चों को मौत के घाट उतार दिया और अब, अदालत ने इस निर्ममता को “दुर्लभ से दुर्लभतम अपराध” मानते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई है।

जिंदगी नहीं, मौत की गोद बनी माँ

यह घटना औरैया कोतवाली क्षेत्र के तालेपुर गांव की है, जहाँ एक महिला ने अपने तीन बच्चों को सेगुर नदी में फेंककर मौत के हवाले कर दिया। जिन बच्चों को उसने नौ महीने कोख में रखा, जिनकी पहली मुस्कान पर वह कभी मुस्कराई होगी, उन्हीं को खुद अपने हाथों से नदी में डुबो दिया।

गांव वालों को जैसे इस पर विश्वास ही नहीं हुआ कि एक माँ ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन हकीकत इससे भी ज़्यादा बेरहम थी।

पुलिस कार्रवाई: महिला ने कबूल किया गुनाह

घटना के बाद गांव में कोहराम मच गया। लोग सन्न थे, अवाक थे। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए महिला को हिरासत में लिया और जब उससे पूछताछ की गई तो उसने खुद ही यह भयानक गुनाह स्वीकार कर लिया। पूछताछ के दौरान महिला ने बताया कि घरेलू विवाद के चलते वह मानसिक रूप से बेहद परेशान थी, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह पीड़ा उसे ऐसे क्रूर अपराध की ओर धकेल देगी।

अदालत में चला मुकदमा, मिला इंसाफ

यह मामला एडीजी-3 न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहां जज सैफ अहमद ने पूरे घटनाक्रम, सबूतों और गवाहों के आधार पर महिला को दोषी करार दिया। न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—

“तीन मासूम जिंदगियों को जानबूझकर खत्म करना सिर्फ हत्या नहीं, यह इंसानियत के नाम पर कलंक है। ऐसे अपराध को समाज कभी माफ नहीं कर सकता।”

सुनाई गई मौत की सजा, ताकि बाकी समाज सीखे सबक

अदालत ने इस घटना को “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” केस मानते हुए दोषी महिला को मृत्युदंड यानी फांसी की सजा सुनाई। जज सैफ अहमद ने अपने फैसले में कहा—

“माँ का दर्जा सबसे पवित्र होता है, लेकिन जब वही माँ हैवान बन जाए तो समाज को एक सख्त संदेश देना ज़रूरी हो जाता है। फांसी की सजा इस अपराध के लिए सबसे उचित और जरूरी है, ताकि दूसरों के मन में भी भय और चेतावनी बनी रहे।”

क्यों किया ऐसा? पारिवारिक विवाद या मानसिक असंतुलन?

जांच के दौरान सामने आया कि महिला का पति से लगातार विवाद चल रहा था। कुछ पड़ोसियों ने बताया कि वह अक्सर अकेली रहती थी और अपने बच्चों की परवरिश भी अकेले ही कर रही थी। पर क्या घरेलू कलह इतनी बड़ी हो सकती है कि एक माँ अपने ही बच्चों को मार दे?

विशेषज्ञों का कहना है कि ये घटनाएं समाज में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और अकेलेपन की भी तरफ इशारा करती हैं, जिन्हें समय रहते नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

समाज में उठते सवाल: क्या यह अकेला मामला है?

यह पहली बार नहीं है जब एक माँ द्वारा बच्चों की हत्या की खबर आई हो। पिछले कुछ वर्षों में भारत के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई चौंकाने वाली घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे मामलों में समाज को न केवल सख्त कानूनों की जरूरत है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता, पारिवारिक काउंसलिंग और महिलाओं के लिए सहारा केंद्रों की भी सख्त जरूरत है।


जब ममता की हत्या होती है…

इस हृदयविदारक मामले ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि अपराध की कोई शक्ल नहीं होती। एक माँ भी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर आ जाती है, जहाँ वह अपने मातृत्व को ही रौंद डालती है।

औरैया की इस घटना को सिर्फ एक आपराधिक खबर मानकर न छोड़ा जाए, बल्कि इसे समाज की चेतावनी की तरह देखा जाए। यह सिर्फ तीन बच्चों की मौत नहीं थी, यह एक पूरे सामाजिक ताने-बाने पर सवाल है।

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