आज सुबह 9:52 बजे, 92 वर्षीय प्रख्यात इतिहासकार एम.जी.एस. नारायणन ने केरल के कोझिकोड में अपने निवास पर अंतिम सांस ली। उनका जाना न केवल केरल, बल्कि भारतीय इतिहास लेखन की एक बड़ी क्षति है। वे केरल के प्राचीन इतिहास को अकादमिक नजरिए से समझने वाले पहले विद्वानों में से थे और उन्होंने भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया।
कौन थे एम.जी.एस. नारायणन?
- जन्म: 20 अगस्त, 1932, पोन्नानी, केरल।
- शिक्षा: मद्रास विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी।
- उपलब्धियाँ:
- 200 से अधिक किताबें और शोध पत्र लिखे, जिनमें 112 अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए।
- केरल का मध्यकालीन इतिहास (Perumals of Kerala) जैसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिसने केरल के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को नए सिरे से परिभाषित किया।
- ICHR के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन में नए मानक स्थापित किए।
क्यों महत्वपूर्ण था उनका योगदान?
- केरल के इतिहास को वैश्विक पहचान दिलाई: उन्होंने केरल के प्राचीन शिलालेखों, सिक्कों और साहित्यिक स्रोतों का गहन अध्ययन करके इस क्षेत्र के इतिहास को एक नया आयाम दिया।
- राजनीतिक इतिहास से आगे: उन्होंने सिर्फ राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं लिखा, बल्कि समाज, संस्कृति और आर्थिक व्यवस्था पर भी शोध किया।
- शिक्षक के रूप में: उन्होंने कई पीढ़ियों के छात्रों को प्रेरित किया, जिनमें आज के कई प्रमुख इतिहासकार शामिल हैं।
Swadesh News का नजरिया:
“एम.जी.एस. नारायणन सिर्फ एक इतिहासकार नहीं थे, बल्कि एक इतिहास के पुनर्निर्माता थे। उन्होंने केरल के इतिहास को मिथकों और किंवदंतियों से निकालकर तथ्यों की जमीन पर खड़ा किया। आज जब हम केरल के प्राचीन समाज, उसके व्यापारिक संबंधों और सांस्कृतिक विकास के बारे में पढ़ते हैं, तो उसकी नींव में नारायणन जी का शोध काम करता है।”
समाज पर क्या छोड़ गए?
- उनके काम ने केरल के दलित और पिछड़े वर्गों के इतिहास को भी सामने लाने में मदद की।
- उन्होंने शिलालेखों और सिक्कों के अध्ययन को नई ऊर्जा दी, जिससे भारतीय इतिहास लेखन में नए दरवाजे खुले।
अंतिम शब्द:
एम.जी.एस. नारायणन का जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनकी किताबें और शोध हमेशा भारतीय इतिहास के छात्रों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। जैसा कि वे कहते थे – “इतिहास सिर्फ अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने की कुंजी है।”
📖 पढ़ने के लिए उनकी प्रमुख किताबें:
- Perumals of Kerala
- Cultural Symbiosis in Kerala
- Reinterpretations in South Indian History





