Mera Chundar Manga De Ho: हरियाणवी संगीत की दुनिया में कुछ लोकगीत ऐसे हैं, जो समय बीतने के साथ पुराने नहीं पड़ते, बल्कि हर नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बना लेते हैं। ऐसा ही एक लोकप्रिय गीत है ‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’, जिसे आज रिलीज के करीब 42 साल बाद भी शादियों, पार्टियों और पारिवारिक समारोहों में खूब सुना जाता है।
इस गीत की खासियत सिर्फ इसकी धुन नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपा भाई-बहन के रिश्ते का बेहद सहज और देसी अंदाज भी है। गीत में एक बहन अपने भाई से पारंपरिक पहनावे और श्रृंगार से जुड़ी चीजें लाने की मांग करती है। यही घरेलू बातचीत और नोकझोंक इसे आम लोगों से जोड़ती है।
Mera Chundar Manga De Ho को दिलराज कौर ने दी आवाज
‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’ 1984 में आई चर्चित हरियाणवी फिल्म ‘चंद्रावल’ का लोकप्रिय गीत है। इस गीत को मशहूर गायिका दिलराज कौर ने अपनी आवाज दी थी। इसके संगीत की जिम्मेदारी जे.पी. कौशिक ने संभाली थी, जबकि गीत के बोल देवी शंकर प्रभाकर ने लिखे थे।
फिल्म के संगीत ने उस दौर में दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई थी। ‘चंद्रावल’ की लोकप्रियता में उसके गीतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही और इसके कई गाने आज भी हरियाणवी लोकसंगीत की पहचान माने जाते हैं।
Mera Chundar Manga De Ho में भाई-बहन का रिश्ता
इस लोकगीत की कहानी का केंद्र एक बहन और उसके भाई के बीच होने वाली बातचीत है। बहन अपने भाई से चुनर, माथे पर पहनने वाला पारंपरिक आभूषण, कुर्ता और घाघरा जैसी चीजें लाने के लिए कहती है। इसके जरिए हरियाणवी समाज के पारंपरिक पहनावे और ग्रामीण जीवन की झलक भी दिखाई देती है।
गीत को जिस अंदाज में पेश किया गया है, उसमें मांगों के साथ अपनापन और हल्की-फुल्की नोकझोंक नजर आती है। यही वजह है कि यह केवल एक फिल्मी गीत बनकर नहीं रहा, बल्कि लोगों के पारिवारिक और सामाजिक आयोजनों का हिस्सा बन गया।
Mera Chundar Manga De Ho में दिखती है हरियाणवी संस्कृति
इस गीत में हरियाणा की पारंपरिक संस्कृति की कई झलकियां देखने को मिलती हैं। चुनरी, घाघरा और पारंपरिक आभूषणों जैसी चीजों का जिक्र उस समय के ग्रामीण पहनावे और सामाजिक परिवेश को सामने रखता है।
गीत की भाषा भी इसकी लोकप्रियता की बड़ी वजह रही। इसमें इस्तेमाल की गई हरियाणवी बोली ने इसे स्थानीय लोगों से सीधे जोड़ दिया। यही कारण है कि कई दशक बीतने के बाद भी इस गीत की पहचान सिर्फ एक पुरानी फिल्म के गाने तक सीमित नहीं रही।
Mera Chundar Manga De Ho आज भी शादियों में बजता है
आज भी हरियाणा और आसपास के इलाकों में शादी-ब्याह और दूसरे समारोहों में इस लोकगीत की धुन सुनाई देती है। खासकर ऐसे मौकों पर जब परिवार के लोग और रिश्तेदार मिलकर पारंपरिक गीतों पर नाचते-गाते हैं, यह गाना माहौल को खास बना देता है।
इस गीत की लोकप्रियता केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रही। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी हरियाणवी लोकगीतों के बीच इसे लंबे समय से सुना जाता रहा है। समय के साथ कई अन्य गायकों ने भी इसके अलग-अलग संस्करण पेश किए हैं।
Mera Chundar Manga De Ho के कई री-वर्जन भी आए
पुराने लोकगीतों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाद के वर्षों में कई गायकों ने ‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’ को अपने अंदाज में पेश किया। रिपोर्ट के अनुसार डॉली शर्मा, आशा लता और रेणुका पंवार जैसे गायकों ने भी इसके अलग-अलग संस्करण गाए हैं।
हालांकि नए दौर में संगीत की शैली काफी बदल गई है, लेकिन इस गीत की मूल लोकधुन और भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ी कहानी अब भी लोगों को आकर्षित करती है। यही वजह है कि अलग-अलग पीढ़ियों के बीच इसका जुड़ाव बना हुआ है।
Mera Chundar Manga De Ho और फिल्म चंद्रावल का कनेक्शन
‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’ को 1984 में रिलीज हुई हरियाणवी फिल्म ‘चंद्रावल’ से खास पहचान मिली। फिल्म को हरियाणवी सिनेमा की चर्चित फिल्मों में गिना जाता है और इसका संगीत दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। फिल्म के साउंडट्रैक में ‘जीजा तू काला मैं गोरी घणी’, ‘गाड़े आली गजबन छोरी’, ‘मैं सूरज तू चंद्रावल’, ‘नैन कटोरे काजल डोरे’ और ‘उज्जड़ खेड़े’ जैसे गीत भी शामिल थे।
‘चंद्रावल’ की कहानी और इसके संगीत ने उस दौर में हरियाणवी सिनेमा को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। फिल्म की सफलता के बाद इसके गीत लंबे समय तक लोगों की जुबान पर रहे।
Mera Chundar Manga De Ho की लोकप्रियता आज भी कायम
करीब चार दशक से ज्यादा समय गुजरने के बावजूद ‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’ का नाम हरियाणवी लोकगीतों में आज भी सुनाई देता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यही है कि गीत में किसी जटिल कहानी के बजाय रोजमर्रा के रिश्ते और पारंपरिक जीवन को सहज तरीके से सामने रखा गया है।
भाई-बहन के बीच प्यार, अपनापन और हल्की नोकझोंक से जुड़ी इसकी थीम इसे पारिवारिक समारोहों के लिए आज भी प्रासंगिक बनाती है। यही वजह है कि 1984 के दौर में लोकप्रिय हुआ यह गीत आज की पीढ़ी के बीच भी अलग-अलग रूपों में सुना और पसंद किया जा रहा है।
Mera Chundar Manga De Ho के साथ चंद्रावल की विरासत
‘चंद्रावल’ की लोकप्रियता का सिलसिला मूल फिल्म के बाद भी जारी रहा। वर्ष 2012 में इस फिल्म का सीक्वल ‘चंद्रावल-2’ भी रिलीज हुआ था। मूल फिल्म के संगीत और कहानी से जुड़ी यादें आज भी हरियाणवी सिनेमा और लोकसंगीत के प्रशंसकों के बीच बनी हुई हैं।
‘मेरा चूंदड़ मंगा दे हो’ इसी विरासत का एक ऐसा गीत है, जिसने फिल्म से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाई। यही कारण है कि 42 साल बाद भी जब किसी हरियाणवी शादी या समारोह में इसकी धुन बजती है, तो कई लोगों को पुराने दौर के लोकसंगीत और पारंपरिक पारिवारिक माहौल की याद आ जाती है।


