BY: Yoganand Shrivastva
आज बॉलीवुड अभिनेत्री मनीषा कोइराला 55 वर्ष की हो चुकी हैं। उन्होंने सुभाष घई की फिल्म ‘सौदागर’ से हिंदी फिल्मों में डेब्यू किया था और इसके बाद लगातार बड़े अभिनेताओं के साथ काम करते हुए सफलता की ऊँचाइयाँ छुईं। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब नशे और निजी जीवन की उलझनों ने उनका करियर डगमगा दिया। हालांकि, कैंसर से लड़ाई जीतने के बाद मनीषा ने एक नई पहचान बनाई और आज वे दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल मानी जाती हैं।
परिवार और संघर्ष की पृष्ठभूमि
मनीषा के परदादा कृष्ण प्रसाद कोइराला नेपाल के जाने-माने व्यवसायी थे। लेकिन राजनीतिक मतभेदों के चलते उन्हें सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। यहाँ उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा और उन्होंने सड़क पर फूल-मालाएँ बेचकर परिवार का भरण-पोषण किया। मनीषा अक्सर अपनी दादी से सुना करती थीं कि परिवार ने किस तरह कठिनाइयों का सामना किया और स्वाभिमान बनाए रखा।
उनकी दादी बताया करती थीं कि उनके दादाजी के पास सिर्फ एक जोड़ी कपड़ा होता था, जिसे दिनभर पहनते और रात में धोकर गमछे में रहते थे। फटी चप्पलें और सादगी भरा जीवन उनकी यादों का हिस्सा रहा। यही त्याग, संघर्ष और आदर्श मनीषा के बचपन का आधार बने।
साधारण माहौल में गुजरा बचपन
मनीषा की शुरुआती पढ़ाई वाराणसी के बसंत कन्या महाविद्यालय में हुई। उनके घर का वातावरण आदर्शवादी और बौद्धिक चर्चाओं से भरा रहता था। प्रोफेसर, लेखक और राजनेता अक्सर घर पर आते-जाते थे। परिवार सीमित साधनों में रहता था, लेकिन सिद्धांतों और संस्कारों पर हमेशा जोर दिया जाता था।
शास्त्रीय नृत्य और खेलों से जुड़ाव
मनीषा की दादी मणिपुरी और भरतनाट्यम की नृत्यांगना थीं और उनकी माँ कथक करती थीं। इसलिए बचपन से ही घर में कला का माहौल रहा। मनीषा ने मात्र 3 वर्ष की उम्र से नृत्य सीखना शुरू किया। इसके अलावा, वे खेलों में भी सक्रिय रहीं और बास्केटबॉल में राज्य स्तर पर हिस्सा लिया। स्कूल की पढ़ाई से ज्यादा उन्हें खेलकूद और नृत्य में आनंद आता था।
स्कूल के दिनों की दिलचस्प बातें
राजनीतिक परिवार से होने के बावजूद खाने-पीने की स्थिति साधारण थी। मनीषा को अपने टिफिन का खाना पसंद नहीं आता था, इसलिए वे अक्सर दोस्तों का डिब्बा खाने लगीं। वह बताती हैं कि दोस्तों के घर से लाए गए खाने में उन्हें सादगी और स्वाद का मज़ा मिलता था।
डॉक्टर बनने का सपना
दिल्ली के आर्मी पब्लिक स्कूल (धौला कुआँ) में पढ़ाई के दौरान उनका सपना डॉक्टर बनने का था। हालांकि पढ़ाई में वे बहुत गहरी नहीं थीं, लेकिन चुनौती मिलने पर वे डटकर मेहनत करती थीं। एक बार जब किसी ने कहा कि वे साइंस में कमजोर हैं और डॉक्टर नहीं बन पाएँगी, तो मनीषा ने जी-जान लगाकर पढ़ाई की और अच्छे अंक हासिल किए।
मॉडलिंग से फिल्मों की ओर
जेब खर्च के लिए मनीषा ने मॉडलिंग शुरू की, जिसने उन्हें अभिनय की दुनिया की ओर खींचा। 1989 में उन्होंने नेपाली फिल्म ‘फेरी भेटौला’ से करियर शुरू किया। बॉलीवुड में उनका पहला बड़ा मौका सुभाष घई की ‘सौदागर’ (1991) से मिला।
शुरुआती संघर्ष
मनीषा को पहले शेखर कपूर ने अपनी फिल्म के लिए साइन किया था, लेकिन वह फिल्म पूरी नहीं हो सकी। बाद में बोनी कपूर ने उन्हें ‘प्रेम’ फिल्म में लेने का वादा किया था। पहले इस फिल्म के लिए तब्बू को अप्रोच किया गया था, लेकिन मना करने के बाद फिर वही रोल उन्हें दिया गया। हालांकि अंततः तब्बू ने ही यह फिल्म की और ‘प्रेम’ रिलीज़ भी ‘सौदागर’ के कई साल बाद हुई।
सफलता, विवाद और गिरावट
‘1942: ए लव स्टोरी’, ‘दिल से’, ‘बॉम्बे’ जैसी फिल्मों से मनीषा सुपरस्टार बनीं। लेकिन करियर के शिखर पर वे शराब और नशे की गिरफ्त में आ गईं। अफेयर्स और निजी जीवन की चर्चाएँ उनके करियर पर भारी पड़ीं। कई बार उन्हें ‘बेकार एक्ट्रेस’ तक कहा गया।
कैंसर पर जीत और नई पहचान
2012 में मनीषा को अंडाशय का कैंसर हुआ। न्यूयॉर्क में उनका इलाज हुआ और उन्होंने साहस के साथ इस बीमारी को मात दी। आज वे कैंसर सर्वाइवर के रूप में लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं। वे किताबें लिख रही हैं, मोटिवेशनल स्पीच देती हैं और फिल्मों में भी चुनिंदा भूमिकाओं के साथ काम कर रही हैं।





