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Jharkhand : झामुमो का 47वां स्थापना दिवस: दिशोम गुरु की विरासत और दुमका से राजनीतिक संकल्प का सफर

Jharkhand

रिपोर्टर -आगस्टीन हेम्बरम

Jharkhand दुमका: झारखंड की राजनीति में स्तंभ माने जाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने 2 फरवरी को दुमका के ऐतिहासिक गांधी मैदान में अपना 47वां स्थापना दिवस मनाया। इस वर्ष का आयोजन भावुकता से भरा रहा, क्योंकि पार्टी ने पहली बार अपने संस्थापक और ‘दिशोम गुरु’ दिवंगत शिबू सोरेन की अनुपस्थिति में यह स्थापना दिवस मनाया। राज्य के आंदोलनकारी नेता शिबू सोरेन के निधन के बाद कार्यकर्ताओं के चेहरों पर उनकी कमी साफ देखी गई, लेकिन पार्टी की विचारधारा को आगे बढ़ाने का संकल्प अटूट नजर आया।

आंदोलन की त्रिमूर्ति: धनबाद से दुमका तक का सफर

Jharkhand झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव 4 फरवरी 1973 को धनबाद में रखी गई थी। पार्टी के उदय में शिबू सोरेन, एके राय और बिनोद बिहारी महतो की त्रिमूर्ति का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

  • संगठन का विस्तार: धनबाद में स्थापना के चार साल बाद, 2 फरवरी 1977 को शिबू सोरेन ने दुमका में जिला कमेटी का गठन किया।
  • परंपरा: तब से लेकर आज तक, हर साल 2 फरवरी को दुमका में पार्टी अपना स्थापना दिवस मनाती आ रही है, जो अब झारखंड की सत्ताधारी पार्टी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है।

‘ढरूआक’ और खजूर की लकड़ी: संघर्ष के शुरुआती दिन

Jharkhand दुमका सांसद और पूर्व मंत्री नलिन सोरेन ने पार्टी के शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए साझा किया कि उस दौर में संचार और संसाधनों का घोर अभाव था।

  • सूचना तंत्र: ग्रामीणों तक संदेश पहुँचाने के लिए संताली परंपरा ‘ढरूआक’ का सहारा लिया जाता था, जिसमें एक लंबे डंडे पर हरे पत्तों को बांधकर हाट-बाजारों में घुमाया जाता था।
  • प्रचार का माध्यम: उस समय दीवारों पर संदेश लिखने के लिए आधुनिक ब्रश नहीं थे, इसलिए खजूर की लकड़ी की कूची (ब्रश) बनाकर दीवारों पर पार्टी की नीतियों को लिखा जाता था। ये यादें आज भी पुराने कार्यकर्ताओं को भावुक कर देती हैं।

सांस्कृतिक पहचान और वर्तमान राजनैतिक वर्चस्व

Jharkhand स्थापना दिवस समारोह में न केवल राजनीतिक भाषण हुए, बल्कि झारखंड की समृद्ध संस्कृति की झलक भी देखने को मिली। संताल परगना के सुदूर इलाकों से आए कार्यकर्ताओं ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में भागीदारी की। पार्टी नेताओं ने जोर दिया कि झामुमो आज जिस मुकाम पर है, उसके पीछे दशकों का संघर्ष और जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संकल्प है। शिबू सोरेन के दिखाए रास्ते पर चलकर ही राज्य का विकास सुनिश्चित किया जाएगा।

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