स्टार रेटिंग: 3.5/5
निर्देशक: श्रीराम राघवन
शैली: वॉर ड्रामा
कलाकार: धर्मेंद्र, अगस्त्य नंदा, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
Ikkis Review: श्रीराम राघवन की फिल्म ‘इक्कीस’ एक पारंपरिक युद्ध फिल्म नहीं है। यह गोलियों, धमाकों और नारेबाजी से ज्यादा उस खामोशी की कहानी कहती है, जो युद्ध खत्म होने के बाद बच जाती है। यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध में परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता से प्रेरित है, लेकिन इसका फोकस जीत पर नहीं, बल्कि उस कुर्बानी की इंसानी कीमत पर है।
Ikkis Review: दो समयरेखाओं में बहती संवेदना
फिल्म की कहानी दो टाइमलाइन में चलती है। पहली 1971 की, जहां अरुण खेत्रपाल का सैन्य जीवन, आदर्शवाद और अंतिम युद्ध दिखाया गया है। दूसरी 2001 की, जहां उसके पिता एम.एल. खेत्रपाल (धर्मेंद्र) उस बेटे की यादों के साथ जी रहे हैं, जो लौटकर कभी नहीं आया। दोनों समयरेखाएं मिलकर यह सवाल खड़ा करती हैं कि युद्ध सिर्फ मैदान में खत्म होता है, दिलों में नहीं।

धर्मेंद्र की खामोशी सबसे बुलंद
फिल्म की आत्मा धर्मेंद्र हैं। अपने आखिरी फिल्मी किरदार में वह एक ऐसे पिता बने हैं, जो बेटे की शहादत पर रोता नहीं, लेकिन भीतर ही भीतर टूट जाता है। उनके चेहरे की स्थिरता, आंखों की नमी और संवादों से ज्यादा खामोशी दर्शकों को गहराई से छूती है। यह अभिनय शोर नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे असर करता है और लंबे समय तक साथ रहता है।
Ikkis Review: अगस्त्य नंदा का संयमित लेकिन ईमानदार प्रयास
अगस्त्य नंदा के लिए अरुण खेत्रपाल का किरदार आसान नहीं था। उन्होंने इस भूमिका को सुपरहीरो की तरह नहीं, बल्कि एक जिद्दी, आदर्शवादी और सवाल करने वाले युवा अफसर की तरह निभाया है। कुछ भावनात्मक दृश्यों में उनका अभिनय सपाट लगता है, लेकिन युद्ध के दृश्यों में उनकी प्रतिबद्धता और सच्चाई साफ नजर आती है। जलते टैंक में डटे रहने वाला दृश्य फिल्म का सबसे प्रभावशाली पल है।

जयदीप अहलावत और इंसानियत की परत
जयदीप अहलावत पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नासिर के रोल में सीमित स्क्रीन टाइम में भी गहरी छाप छोड़ते हैं। उनका किरदार यह दिखाता है कि सरहदों के पार भी इंसानियत, सम्मान और साझा दर्द मौजूद होता है। धर्मेंद्र और जयदीप के बीच के दृश्य फिल्म को भावनात्मक ऊंचाई देते हैं।
Ikkis Review: सिनेमैटोग्राफी और निर्देशन
‘इक्कीस’ युद्ध को तमाशा नहीं बनाती। सीमित वीएफएक्स, सधे हुए कैमरा एंगल और शांत बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को वास्तविक बनाते हैं। कई जगह खामोशी ही सबसे बड़ा प्रभाव छोड़ती है। हालांकि 143 मिनट की लंबाई फिल्म को थोड़ा खींच देती है और सेकेंड हाफ में एडिटिंग और टाइट हो सकती थी।
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‘Ikkis Review: इक्कीस’ हर दर्शक के लिए नहीं है। यह फिल्म रोमांच नहीं, ठहराव मांगती है। यह उन लोगों के लिए है, जो बहादुरी के पीछे छुपे इंसानी दर्द को समझना चाहते हैं। कुछ कमियों के बावजूद, धर्मेंद्र का अभिनय, संवेदनशील निर्देशन और इंसानियत की परतें इसे एक जरूरी और सम्मानजनक फिल्म बनाती हैं।





