‘मर चुका इंसान कॉल कैसे कर सकता है?’ अदालत ने पुलिस की जांच पर उठाए सवाल, दो निर्दोषों को किया बरी

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BY: Yoganand Shrivastva

मध्य प्रदेश: उच्च न्यायालय की एक डिवीजन बेंच ने हाल ही में एक हत्या के मामले में पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए दो आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया और जांच अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई के आदेश दिए हैं। जजों ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “कोई व्यक्ति मरने के बाद अपनी प्रेमिका से फोन पर बात कैसे कर सकता है?” अदालत ने इस टिप्पणी के साथ मामले की जांच को अविश्वसनीय करार दिया और जांच एजेंसियों को भविष्य में सावधानीपूर्वक काम करने की हिदायत भी दी।

मामले की पृष्ठभूमि

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में 19 सितंबर 2021 को राजेंद्र नामक युवक लापता हो गया था, जिसकी कुछ समय बाद लाश बरामद हुई। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में नैन सिंह धुर्वे और उसके बेटे को हत्या का दोषी बताते हुए गिरफ्तार किया था। पांच महीने बाद, पुलिस ने केरल में काम कर रहे चेत सिंह नाम के एक युवक को मामले का प्रमुख गवाह बना दिया। चेत सिंह ने अदालत में बयान दिया कि घटना वाले दिन उसकी बाइक खराब हो गई थी, जिसके बाद वह आरोपियों के घर पर रुका और वहीं उसने देखा कि वे एक व्यक्ति की पिटाई कर रहे थे।

सेशन कोर्ट का फैसला और उच्च न्यायालय की टिप्पणी

मंडला की सत्र अदालत ने पुलिस जांच और गवाह के बयानों के आधार पर दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की पीठ ने इस फैसले को पलट दिया।

कोर्ट ने पाया कि मृतक राजेंद्र की कॉल डिटेल्स से यह स्पष्ट होता है कि 25 सितंबर तक वह एक लड़की से लगातार बात कर रहा था। जबकि पुलिस ने उसकी मौत 19 सितंबर को होने का दावा किया था। अदालत ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “विज्ञान अभी इतना भी विकसित नहीं हुआ है कि कोई मृत व्यक्ति फोन पर बातचीत कर सके।”

गवाह और सबूतों पर संदेह

अदालत ने यह भी पाया कि चेत सिंह को जबरन गवाह बनाया गया था और पुलिस ने उस लड़की का बयान तक दर्ज नहीं किया, जिसके साथ मृतक के प्रेम संबंध होने की बात कही गई थी। न ही मृतक के परिजनों ने कभी इस प्रेम संबंध की पुष्टि की थी और न ही यह संकेत दिया था कि लड़की के परिवार को उससे कोई आपत्ति थी।

पुलिस पर कार्रवाई के निर्देश

न्यायालय ने इस लापरवाहीपूर्ण जांच को गंभीर मानते हुए जांच अधिकारी व अन्य संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने निर्देश दिया है कि 30 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए। साथ ही, मध्य प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को पूरे राज्य में निष्पक्ष और ठोस जांच सुनिश्चित करने हेतु दिशानिर्देश जारी करने को भी कहा गया है।

पूर्व में भी उठे हैं सवाल

यह कोई पहला मामला नहीं है, जब अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हों। मालेगांव विस्फोट और महाराष्ट्र ट्रेन ब्लास्ट जैसे मामलों में भी अदालतें यह कह चुकी हैं कि जांच में भारी खामियां थीं, जिसके कारण कई निर्दोषों को वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

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