Vijay Nandan (वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल एडिटर)
Hasya Hathoda ; कहते हैं, पानी जीवन है, पर आजकल हमारे शहरों के कई इलाकों में यह जीवन का नहीं, व्यवस्था का पोस्टमार्टम करता दिख रहा है। नल खुलते ही जो बहता है, वह पानी कम और भरोसे का रिसाव ज्यादा लगता है। नागरिक उसे पीने से पहले भगवान को याद करते हैं, फिर डॉक्टर को, और अंत में सरकार को क्योंकि तीनों की जरूरत पड़ती है।
Hasya Hathoda ; सरकारी फाइलें बताती हैं कि जल शुद्ध है, रिपोर्टें मुस्कुरा रही हैं और योजनाएँ सफल होकर सेवानिवृत्ति की ओर बढ़ चुकी हैं। मगर अस्पतालों की ओपीडी में पेट दर्द, पीलिया और संक्रमण की भीड़ देखकर लगता है कि ये बीमारियाँ सरकारी रिपोर्ट पढ़कर नहीं आतीं।

Hasya Hathoda ; पाइप लाइनें इतनी पुरानी हैं कि उन्हें देखकर इतिहास खुद पानी-पानी हो जाए। कहीं जंग घुला है, कहीं सीवेज मिला है, तो कहीं टैंकरों का लोकतांत्रिक योगदान है। इसके बावजूद हर साल बजट में “जल जीवन उजाला” पूरे जोश के साथ आता है। नल लगते हैं, फोटो खिंचती हैं, फीते कटते हैं, और पानी… वही का वही रहता है।
Hasya Hathoda ; जिम्मेदारी की बात छेड़िए तो जवाबों की रिले रेस शुरू हो जाती है, नगर पालिका विभाग की ओर इशारा करती है, विभाग ठेकेदार की तरफ और ठेकेदार मुस्कुराकर कहता है, जनता को एडजस्ट करना चाहिए।
Hasya Hathoda ; सबसे मनोरंजक दृश्य तब बनता है जब नेता बोतलबंद पानी की घूंट लेते हुए जनता को नल का पानी पीने का आत्मविश्वास देते हैं। कागजों में पानी इतना साफ है कि उसमें सच्चाई दिखाई नहीं देती, लेकिन गिलास में सच्चाई इतनी साफ है कि पानी दिखाई नहीं देता।
शायद अब वक्त आ गया है कि पानी को केवल योजना नहीं, जिम्मेदारी माना जाए। क्योंकि जब पानी दूषित होता है, तो केवल पेट नहीं बिगड़ता, पूरी व्यवस्था दस्त में चली जाती है और तब हास्य-हथौड़ा चलाना मजबूरी नहीं, जरूरत बन जाता है।
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