शॉर्ट सर्किट से लगी आग, कई किसानों की खड़ी फसल जलकर राख

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Fire broke out due to short circuit, standing crops of many farmers burnt to ashes

रिपोर्ट: विजय तिवारी, रीवा
रीवा ज़िले के सेमरिया थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत बेला से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है। यहां बिजली की लूज़ तार से हुए शॉर्ट सर्किट के कारण खड़ी फसलों में भीषण आग लग गई, जिससे कई एकड़ में फैली तैयार फसल जलकर राख हो गई।

जैसे ही आग की सूचना फैली, किसानों में अफरा-तफरी मच गई। खेतों में आग की लपटें उठती देख किसान चीखते-चिल्लाते हुए खेतों की ओर दौड़े। आसपास के गांवों के लोग भी मौके पर पहुंच गए और पेड़ों की टहनियों से पीट-पीटकर कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिन किसानों की फसलें जली हैं, उनमें बुद्धसेन त्रिपाठी, चंद्र प्रताप त्रिपाठी और नारायण पांडे प्रमुख रूप से शामिल हैं। बताया जा रहा है कि किसानों के खेतों के पास से गुजर रही बिजली की तार लूज़ हालत में थी, जिससे निकली चिंगारी ने खड़ी फसलों को अपनी चपेट में ले लिया।

किसानों का कहना है कि वे पहले ही कर्ज और महंगाई से परेशान हैं, अब फसल जलने से वे पूरी तरह तबाह हो गए हैं। कई किसान भूखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं।

मौके पर प्रशासनिक अमले की मौजूदगी की पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन ग्रामीणों ने मांग की है कि जल्द से जल्द बिजली विभाग की लापरवाही की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई हो और किसानों को मुआवज़ा दिया जाए।

स्थानीय निवासियों की मांग:

  • बिजली तारों की नियमित जांच
  • प्रभावित किसानों को तुरंत मुआवज़ा
  • खेतों के आसपास की लाइनें अंडरग्राउंड करने की योजना

यह घटना न सिर्फ प्रशासन की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में बिजली व्यवस्था की जर्जर हालत को भी सामने लाती है।

गेहूं या धान की नरवाई (फसल के अवशेष) जलाना एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है, जिसे रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन पर अमल करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। आइए जानते हैं इस पर रोक के लिए क्या कानून है, क्यों अमल नहीं हो पा रहा है, और इसका असर क्या होता है।


क्या है नरवाई जलाने पर रोक का कानून?

  1. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986)
    इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार ने फसल अवशेष जलाने पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत:
    • फसल अवशेष जलाना वायु प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधि है।
    • ऐसा करने पर किसानों पर जुर्माना और एफआईआर तक की कार्रवाई की जा सकती है।
  2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश
    NGT ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि नरवाई जलाना प्रतिबंधित है और राज्यों को इसकी निगरानी कर सख्ती से रोक लगानी चाहिए।
  3. राज्य सरकारों के अपने नियम
    पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों ने नरवाई जलाने पर स्थानीय आदेश और जुर्माने तय किए हैं (जैसे ₹2,500 से ₹15,000 तक जुर्माना क्षेत्र और भूमि की मात्रा के हिसाब से)।

फिर भी अमल क्यों नहीं हो पा रहा है?

  1. विकल्पों की कमी
    किसानों के पास फसल अवशेष नष्ट करने या उसके निपटारे के लिए सस्ते और व्यावहारिक विकल्प नहीं हैं। मशीनें (जैसे हैप्पी सीडर, सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम) महंगी हैं।
  2. अज्ञानता और जागरूकता की कमी
    बहुत से किसान यह नहीं जानते कि नरवाई जलाने से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है या क्या वैकल्पिक उपाय हैं।
  3. निगरानी की कमी
    प्रशासन के पास इतनी जनशक्ति और संसाधन नहीं होते कि हर खेत की निगरानी कर सके।
  4. अर्थव्यवस्था और समय का दबाव
    गेहूं काटने के बाद किसान को अगली फसल (जैसे धान या सब्जी) जल्दी बोनी होती है, इसलिए वह फसल अवशेष जलाकर खेत खाली करने को मजबूर होता है।
  5. कानून का डर नहीं
    बहुत से मामलों में कार्रवाई केवल “दिखावे” की होती है। जब किसान देखते हैं कि दूसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही, तो वे भी नरवाई जलाने लगते हैं।

इसका असर क्या होता है?

  • वायु प्रदूषण में भारी बढ़ोतरी (खासकर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में)
  • मिट्टी की उर्वरता में कमी
  • छोटे जीव-जंतुओं और कीड़ों की मृत्यु
  • खेत की जैविक गुणवत्ता पर असर
  • सांस और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ती हैं

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