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हरदा मंडी में अनाज तुलाई बंद होने पर भड़के किसान, तहसीलदार बोले इनके बाप का राज है

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Farmers got angry when weighing of grains stopped in Harda Mandi, Tehsildar said it is his father's rule.

धनतेरस से ठीक पहले अनाज नहीं बिकने से निराश किसान, समर्थन में उतरी कांग्रेस

रिपोर्ट- राजेंद्र बिल्लौरे, एडिट- विजय नंदन

हरदा: धनतेरस से ठीक पहले मध्यप्रदेश के हरदा जिले में कृषि उपज मंडी में तुलाई बंद होने से किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। शुक्रवार को मंडी में किसानों और व्यापारियों के बीच खरीदी के भाव को लेकर जमकर बहस और हंगामा हुआ। स्थिति बिगड़ते देख तहसीलदार राजेंद्र पवार और सिटी कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची। मंडी में अव्यवस्था देखकर तहसीलदार का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने मंडी कर्मचारियों को जमकर फटकार लगाते हुए कहा कि अगर आप मंडी को ठीक से नहीं चला सकते तो इसे बंद कर दो। व्यापारियों को संघर्ष करना नहीं आता तो छोड़ दो व्यापार! इतने वीआईपी हैं कि किसी किसान ने कुछ कह दिया तो मंडी छोड़ देंगे क्या? इनके बाप का राज है क्या!

तहसीलदार ने कर्मचारियों को सख्त चेतावनी दी कि मंडी व्यवस्था को तत्काल दुरुस्त किया जाए और खरीदी प्रक्रिया सुचारु रूप से शुरू की जाए। इस दौरान कांग्रेस जिलाध्यक्ष मोहन साई भी किसानों के बीच पहुंचे। किसानों ने उनके सामने अपना आक्रोश जाहिर करते हुए कहा कि धनतेरस के एक दिन पहले तुलाई बंद है और उपज के भाव बहुत कम मिल रहे हैं। इससे किसानों में गहरा असंतोष है।

कांग्रेस जिलाध्यक्ष मोहन साई ने किसानों के समर्थन में प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि तुरंत खरीदी शुरू नहीं हुई, तो वे आंदोलन करेंगे। विरोध स्वरूप वे किसानों के साथ सड़क पर कुछ देर के लिए धरने पर भी बैठे। हालांकि, तहसीलदार की समझाइश के बाद मामला शांत हुआ और मोहन साई ने किसानों से शांति बनाए रखने की अपील की।

प्रशासनिक तंत्र में सख्त एक्शन का खौफ नहीं इसलिए किसानों के साथ होती है मनमानी

हरदा जिले की कृषि उपज मंडी में किसानों की नाराजगी सामने आना पहली बार नहीं है। ऐसा लगता है कि सिस्टम पर सरकार की पकड़ पूरी तरह से नहीं है। ये तब है जब हाल ही में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने किसानों के हित में भावांतर योजना लागू की थी, ताकि उन्हें फसल का उचित मूल्य मिल सके। लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। किसानों को न तो सही भाव मिल रहा है, न ही मंडियों में समय पर खरीदी हो रही है।

मंडी में व्यवस्था इतनी बिगड़ चुकी है कि तहसीलदार राजेंद्र पंवार को खुद पहुंचकर कर्मचारियों को फटकार लगानी पड़ी। ये इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रशासनिक तंत्र में भी ढिलाई आ गई है और सरकारी योजनाएं कागजों में सिमटती जा रही हैं। किसानों का सवाल वाजिब है। जब सरकार किसानों के लिए योजनाएं बनाती है, तो क्या उन्हें लागू कराने की जिम्मेदारी सिर्फ कागज तक ही रह जाती है? मंडियों में अव्यवस्था, मनमानी और किसानों की अनदेखी से ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक तंत्र से “सरकार का डर” खत्म होता जा रहा है।

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