संवाददाता: संतोष सरावगी
Dabra (ग्वालियर): मध्य प्रदेश सरकार एक ओर अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के उत्थान और शिक्षा के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। ग्वालियर जिले की डबरा तहसील के बुजुर्ग क्षेत्र में स्थित ‘शासकीय सीनियर छात्रावास क्रमांक-2’ बदहाली का पर्याय बन चुका है, जहाँ छात्र डर और सुविधाओं के अभाव में रहने को मजबूर हैं।

निजी भवन में लाखों का खेल, मौके से जिम्मेदार नदारद
Dabra यह शासकीय छात्रावास एक निजी इमारत में संचालित किया जा रहा है, जिसका अनुमानित किराया लगभग 50,000 रुपये प्रतिमाह बताया जा रहा है। इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी यहाँ अव्यवस्थाओं का अंबार है। निरीक्षण के दौरान न तो छात्रावास प्रभारी मौके पर मिले और न ही कोई चौकीदार तैनात था। छात्रों ने बताया कि वे अपनी समस्याओं को लेकर असमंजस में हैं, क्योंकि उनकी सुनने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी वहाँ मौजूद नहीं रहता।

‘जली रोटियां और पतली दाल’— मीनू के नाम पर खिलवाड़
Dabra छात्रावास में रहने वाले छात्रों ने खाने की गुणवत्ता पर गंभीर आरोप लगाए हैं। छात्रों का कहना है कि जब से नया चौकीदार/रसोइया आया है, खाने का स्तर बेहद गिर गया है।
- मीनू का उल्लंघन: भोजन कभी भी निर्धारित मीनू के अनुसार नहीं दिया जाता।
- खराब गुणवत्ता: छात्रों को अक्सर जली हुई रोटियां और पानी जैसी पतली दाल परोसी जाती है।
- साफ-सफाई का अभाव: परिसर में सफाई कर्मचारी न होने के कारण गंदगी का बोलबाला है, जिससे छात्रों के स्वास्थ्य पर भी संकट मंडरा रहा है।
दोहरे प्रभार के बीच पिसता भविष्य
Dabra इस अव्यवस्था के पीछे प्रशासनिक लापरवाही भी एक बड़ा कारण है। छात्रावास के प्रभारी धाराजीत चप्पल के पास वर्तमान में सीनियर और जूनियर दोनों छात्रावासों का प्रभार है। प्रभार के इस बोझ के कारण वे किसी भी छात्रावास पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। छात्रों ने दबी जुबान में बताया कि वे शिकायत करने से भी डरते हैं, क्योंकि उन्हें वहीं रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करनी है। डबरा का यह शासकीय छात्रावास वर्तमान में पूरी तरह जर्जर और उपेक्षित स्थिति में है।
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