अजीबोगरीब 31 January: यांग्सी गाँव का रहस्य: जहाँ थम जाता है इंसानी कद, क्या यह कुदरत का खेल है या कोई प्राचीन श्राप?

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अजीबोगरीब

अजीबोगरीब  शिचुआन (चीन): आधुनिक विज्ञान और तकनीक के इस दौर में भी कुछ रहस्य ऐसे हैं जो तर्क और बुद्धि को चुनौती देते हैं। चीन के सुदूर शिचुआन प्रांत में बसा ‘यांग्सी गाँव’ एक ऐसी ही पहेली है। यहाँ समय तो अपनी गति से चलता है, लेकिन इंसानी शरीर की ऊंचाई एक खास उम्र के बाद बढ़ना बंद हो जाती है। इस अजीबोगरीब घटना के कारण इसे दुनिया भर में ‘बौनों के गाँव’ के नाम से जाना जाता है।

सात साल की उम्र और विकास पर ‘ब्रेक’

अजीबोगरीब यांग्सी गाँव की सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि यहाँ जन्म लेने वाले बच्चे शुरुआत में बिल्कुल सामान्य होते हैं। उनकी खेल-कूद और शारीरिक वृद्धि सात साल की उम्र तक अन्य बच्चों जैसी ही रहती है। लेकिन जैसे ही वे सातवें साल की दहलीज पार करते हैं, उनकी लंबाई बढ़ना रहस्यमयी ढंग से रुक जाती है। गाँव की लगभग 50 प्रतिशत आबादी की लंबाई महज 2 फीट से 3 फीट 10 इंच के बीच है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने यहाँ के निवासियों के विकास पर कोई अदृश्य रोक लगा दी हो।

विज्ञान बनाम अंधविश्वास: श्राप या संक्रमण?

अजीबोगरीब इस गाँव को लेकर कई तरह की कहानियाँ प्रचलित हैं। स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि यह गाँव किसी प्राचीन श्राप की गिरफ्त में है, जिसके कारण पीढ़ियों से लोग इस स्थिति का सामना कर रहे हैं। वहीं, कुछ लोग इसे मिट्टी का दोष या किसी बुरी साये का असर मानते हैं। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यहाँ कई अध्ययन किए हैं। कुछ वैज्ञानिकों का तर्क है कि दशकों पहले यहाँ कोई रहस्यमयी बीमारी फैली थी, जिसने बच्चों की शारीरिक बनावट और उनकी ‘ग्रोथ प्लेट्स’ को स्थायी रूप से प्रभावित कर दिया।

मिट्टी में जहर या युद्ध के अवशेष?

अजीबोगरीब यांग्सी के इस रहस्य को सुलझाने के लिए मिट्टी और पानी के नमूनों की भी जांच की गई है।

  • पारे का प्रभाव: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यहाँ की जमीन और जल स्रोतों में पारे (Mercury) या अन्य भारी धातुओं की मात्रा सामान्य से बहुत अधिक है, जो बच्चों के हार्मोनल विकास को बाधित करती है।
  • गैस का असर: एक अन्य थ्योरी यह भी कहती है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल की गई विषाक्त गैसों का असर मिट्टी में रह गया है, जो जेनेटिक बदलावों का कारण बन रहा है। हालांकि, तमाम दावों के बावजूद आज तक कोई भी वैज्ञानिक इस बात का ठोस प्रमाण नहीं दे पाया है कि आखिर यहाँ कद क्यों छोटा रह जाता है।

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