रिपोर्ट- वैभव चौधरी
धमतरी जिले के नगरी विकासखंड के नक्सल प्रभावित खल्लारी ग्राम पंचायत के चमेंदा और गाताबाहरा गांव में आज भी बच्चे झोपड़ी नुमा स्कूल में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। आज़ादी के 75 साल बाद भी यहां शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाई हैं।
तिरपाल और कपड़े के पर्दे बने “कक्षा”
ग्रामीणों ने बताया कि गांव के पुराने स्कूल भवन इतने जर्जर हो गए थे कि उन्हें डिस्मेंटल करना पड़ा। इसके बाद से बच्चों की पढ़ाई झोपड़ी जैसी अस्थायी संरचनाओं में हो रही है।
- छत के नाम पर तिरपाल और खपरैल डाले गए हैं।
- दीवारें कपड़े और परदों से ढकी हुई हैं।
- बारिश के समय बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो जाती है।
खतरे के साए में शिक्षा
यह इलाका जंगल से सटा हुआ है, जहां सांप-बिच्छुओं और जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। बारिश होने पर बच्चे स्कूल में बैठ नहीं पाते और उन्हें घर लौटना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके बच्चे डर और असुविधा के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों की नाराज़गी
गांव के लोगों ने कई बार शासन-प्रशासन से नए स्कूल भवन की मांग की, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से सिर्फ आश्वासन ही मिल रहे हैं, जबकि उनके बच्चों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।
शिक्षक और शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया
स्कूल के शिक्षक ने भी माना कि मौजूदा स्थिति में शिक्षण कार्य बेहद मुश्किल हो रहा है। उनका कहना है कि अगर नया भवन बन जाए तो बच्चों की पढ़ाई सुचारु रूप से हो सकेगी।
विकासखंड शिक्षा अधिकारी का कहना है कि शासन के निर्देश के मुताबिक जर्जर भवन में बच्चों को बैठाना खतरनाक है, इसलिए फिलहाल गांव वालों द्वारा अस्थायी व्यवस्था की गई है। नए स्कूल भवन के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है और जल्द ही इसके पास होने की संभावना है।





