BY: Yoganand Shrivastva
भिंड, सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी की अदालत ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में देहात थाना पुलिस की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट निर्देशों के बावजूद एफआईआर दर्ज न करने पर थाना प्रभारी मुकेश कुमार शाक्य के खिलाफ न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर कार्यवाही शुरू कर दी है।
मामला क्या है?
यह मामला अपराध क्रमांक 500/2024 से जुड़ा है, जो विशेष सत्र न्यायालय में विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान पीड़िता की उम्र को लेकर भ्रम की स्थिति बन गई, क्योंकि तीन अलग-अलग दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए गए, जिनसे आयु निर्धारण को लेकर संदेह उत्पन्न हुआ।
इन दस्तावेजों को उपनिरीक्षक रत्ना जैन द्वारा कोर्ट में जमा किया गया था। अदालत को शक है कि इनमें से कुछ दस्तावेजों में कूट रचना यानी फर्जीवाड़ा हो सकता है।
कोर्ट ने दिए थे FIR दर्ज करने के निर्देश
21 मार्च 2025 को न्यायालय ने आदेश दिया था कि जिन दस्तावेजों में फर्जीवाड़े की संभावना है, उनके आधार पर एफआईआर दर्ज कर रिपोर्ट पेश की जाए। लेकिन 8 जुलाई 2025 तक न तो थाना प्रभारी और न ही विवेचक की ओर से इस संबंध में कोई कार्रवाई की गई।
न्यायाधीश की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने इस लापरवाही को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173 के तहत गंभीर माना। न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा—
“थाना प्रभारी ने जानबूझकर न्यायालय के विधिक आदेशों की अवहेलना की है। यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि न्यायालय की अवमानना है, जो एक दंडनीय अपराध है।”
थाना प्रभारी की सफाई
जब इस विषय में थाना प्रभारी मुकेश शाक्य से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो उन्होंने संक्षेप में कहा—
“न्यायालय के आदेशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।”
पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में थाना स्तर पर की गई लापरवाही को लेकर अब अदालतें अधिक सख्त हो गई हैं। यह प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि न्यायालय की अनदेखी करने पर कानून के रक्षक भी जवाबदेह बनाए जा सकते हैं।




