By: Abhijeet Tiwari
वो दौर था 1935 से 1940 का जब भारत में आजादी की आवाज बुलंद होती जा रही थी, कई जगह अंग्रेजों के साथ झड़प तो कई जगह शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो रहे थे। जो बरतानिया हुकूमत की नींव हिला रही थी और लंदन में बैठे हुक्मरान भारत पर कब्जा बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन्हें भी यह समझ आ गया था कि, अब उनकी सत्ता जाने वाली है और उन्हें देश छोड़ना होगा… इधर देश को आजादी मिलते देख भारत को बांटने के लिए भी तैयारियां शुरु हो गई थी… और जिन्ना की मुस्लिम लीग भारत से अलग पाकिस्तान बनाने की मांग कर रही थी… लेकिन जिन्ना की इस मांग के बीच में खड़े थे जवाहर लाल नेहरू और माहत्मा गांधी जो देश को किसी भी हाल में बंटने नहीं देना चाहते थे… लेकिन अपनी मांग को पूरा करने और अलग पाकिस्तान बनाने की सनक ने जिन्ना को जल्लाद बना दिया था और उसने 1946 में डायरेक्ट एक्शन डे मनाने का ऐलान किया… डायरेक्ट एक्शन डे ने बंगाल को जला कर रख दिया… और कलकत्ता समेत अन्य शहरों में मुस्लिम लीग के दंगाइयों ने कई हजार हिंदुओं की बरर्बता के साथ हत्या कर दी… महिलाओं की अस्मिता लूटी गई, बच्चे, बुजुर्ग, नौजवानों को जिंदा जला दिया गया… उस दौर की मंजर ऐसा था कि हर तरफ बस लाशें ही लाशें दिख रहीं थी और पूरा कलकत्ता जल रहा था… लेकिन हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को कलकत्ता का एक ब्राह्मण कसाई सहन नहीं कर पाया और वह हिंदुओ को बचाने के लिए सुरक्षा दीवार बन गया…

गोपाल पाठा बना हिंदुओं की सुरक्षा दीवार
गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय जिसे लोग गोपाल पाठा के नाम से जानते थे… गोपाल का जन्म 13 मई 1913 में कलकत्ता के एक सामान्य परिवार में हुआ था… गोपाल के पिता सत्यचरण मुखर्जी मांस व्यापारी थे, और आगे चलकर गोपाल पाठा ने भी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया… लेकिन गोपाल शुरु से ही देश के प्रति समर्पित और उग्र स्वभाव के थे… गोपाल पाठा ने भारतीय जातीय वाहिनी नामक एक संगठन बनाया था जिसका उद्देश प्राकृतिक आपदाओं में लोगों की मदद करना था… इस संगठन में 500 से 800 प्रशिक्षित युवा शामिल थे जो हर परिस्थिति में गोपाल के एक इशारे पर कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थे… 16 अगस्त 1946 को जब जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे मनाने का ऐलान किया… उसके बाद हजारों की संख्या में दूसरे राज्यों से मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता कलकत्ता में जुटने लगे इस दौरान बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुस्लिम लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने लीग के दंगाइयों को हिंसा करने की खुली छूट दे दी और पुलिस को किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने से रोक दिया गया…. जिसके बाद कलकत्ता में हजारों हिदुंओ की हत्या कर दी गई… सड़कों पर सिर्फ खून से सनी लाशें ही दिखाई दे रही थी… हर तरफ चीख पुकार मची हुई थी… बच्चे यतीम हो गए, महिलाएं विधवा हो गई, बुजुर्गों की निर्ममता से हत्या कर दी गई… महिलाओं को दंगाईयों ने अपनी हवस का शिकार बनाया और जिंदा जला दिया…. रोते बिलखते बच्चों पर गाड़ी चढ़ा दी गई… इन दंगों ने गोपाल पाठा को झकझोर कर रख दिया था, और वह समझ गया था कि अगर मुस्लिम लीग को रोका नहीं गया तो कलकत्ता में हिंदु ही नहीं बचेंगे… जिसके बाद गोपाल पाठा ने मोर्चा संभाला और अपने साथियों के साथ हिंदुओं को बचाने के लिए मैदान में उतर पड़े उन्होंने अपने साथियों को एक लक्ष्य दिया कि एक हिंदू के जान के बदले 10 दंगाईयों को मारा जाए… लेकिन उनके पास हथियार और पैसों की कमी थी जिसके लिए उन्होंने सिखों से तलवारें और स्थानीय हिंदु व्यापारियों से धन लिया और बंदूकें खरीदी, फिर गोपाल पाठा ने अपने साथियों के साथ दंगाईयों को इस कदर मारना शुरु किया जैसे कसाई भेड़ बकरियों के शरीर से खाल उतार रहे हों… और पाठा थे भी कसाई जिससे उन्हें इस काम में महारत हासिल थी… पाठा की मार से दंगाई इतने खौफ में आ गए कि उन्हें कहना पड़ गया कि अगर ऐसे ही गोपाल पाठा हमें मारता गया तो नए देश पाकिस्तान में रहने के लिए कोई बचेगा ही नहीं। 20 अगस्त के बाद ब्रिटिश आर्मी गोरखा और सिख रेजिमेंट के साथ कलकत्ता पहुंची, और हालत को सामान्य करने के लिए, कलकत्ता के कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया, इसके बाद गोपाल पाठा ने भी अपनी मुहीम को विराम दिया और वापस अपने व्यवसाय में जुट गए





