एलन मस्क की कंपनी SpaceX द्वारा संचालित Starlink भारत में इंटरनेट सेवाएं शुरू करने जा रही है। यह सेवा खासकर ग्रामीण और इंटरनेट से वंचित क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
सरकारी मंजूरी लगभग पूरी हो चुकी है और इसके बाद भारत में ₹840 प्रति माह में अनलिमिटेड हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा।
स्टारलिंक को मिली DOT से हरी झंडी, IN-SPACe की मंजूरी बाकी
केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया है कि स्टारलिंक को डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन (DoT) से लेटर ऑफ इंटेंट (LOI) मिल चुका है। अब केवल IN-SPACe की फाइनल मंजूरी बाकी है।
“स्टारलिंक की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। LOI जारी कर दिया गया है और IN-SPACe की मंजूरी अंतिम कदम है।”
IN-SPACe क्या है और इसकी भूमिका क्यों अहम है?
IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorization Center) एक सरकारी एजेंसी है, जो भारत में निजी स्पेस कंपनियों को लाइसेंस देने, इन्फ्रास्ट्रक्चर साझा करने और सेवाएं शुरू करने की अनुमति देती है।
2020 में स्थापित यह एजेंसी भारत में स्पेस सेक्टर को खोलने की दिशा में बड़ा कदम है।
TRAI तय करेगा स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट की पॉलिसी
TRAI (भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण) जल्द ही सैटेलाइट इंटरनेट के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति जारी करेगा। यह नीति कमर्शियल ऑपरेशन को रेगुलेट करेगी।
स्टारलिंक को भी वनवेब और रिलायंस की तरह पहले टेस्टिंग के लिए लिमिटेड स्पेक्ट्रम मिलेगा।
₹840 में अनलिमिटेड इंटरनेट: भारत में स्टारलिंक की कीमत

The Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार:
- ₹840 प्रति माह में अनलिमिटेड इंटरनेट प्लान
- यह एक प्रमोशनल कीमत होगी
- उद्देश्य: तेजी से यूजर बेस बनाना (10 मिलियन तक)
स्पेक्ट्रम महंगा, लेकिन स्टारलिंक को नहीं होगी दिक्कत
TRAI ने शहरी यूजर्स के लिए ₹500 मासिक चार्ज का सुझाव दिया है। हालांकि, सैटेलाइट आधारित सेवाएं पारंपरिक ब्रॉडबैंड की तुलना में काफी महंगी हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्टारलिंक जैसी आर्थिक रूप से मजबूत कंपनी भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम है।
TRAI की रेगुलेटरी शर्तें
- 4% AGR फीस (एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू पर)
- ₹3,500 प्रति MHz प्रति वर्ष स्पेक्ट्रम फीस
- 8% लाइसेंस फीस व्यावसायिक सेवाओं पर
इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए सरकार की अंतिम मंजूरी का इंतजार है।
स्टारलिंक के सामने चुनौती: लिमिटेड कैपेसिटी
IIFL रिसर्च के अनुसार:
- 7,000 सैटेलाइट्स से वर्तमान में ~40 लाख यूजर्स को सेवा
- 18,000 सैटेलाइट्स के बावजूद 2030 तक केवल 15 लाख भारतीय यूजर्स तक पहुंच संभव
- अमेरिका और अफ्रीका में भी कैपेसिटी लिमिट के चलते कई जगह सेवाएं रोकनी पड़ी थीं
सैटेलाइट इंटरनेट अभी भी फाइबर ब्रॉडबैंड से महंगा
JM फाइनेंशियल की रिपोर्ट के अनुसार:
- सैटकॉम की लागत फाइबर ब्रॉडबैंड से 7-18 गुना अधिक है
- भारत को कवर करने वाली सैटेलाइट्स की ग्लोबल हिस्सेदारी केवल 0.7-0.8%
स्टारलिंक कैसे काम करेगा: सेटअप और कनेक्शन प्रोसेस

स्टारलिंक यूजर्स को मिलेगा:
- स्टारलिंक डिश
- Wi-Fi राउटर
- पावर केबल और माउंटिंग ट्राइपॉड
- खुले आसमान में रखना जरूरी
- iOS और Android ऐप से सेटअप और निगरानी
यह सेटअप सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी लो-लेटेंसी हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने में सक्षम होगा।
भारत के डिजिटल भविष्य की नई शुरुआत
स्टारलिंक की भारत में एंट्री डिजिटल इंडिया मिशन के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकती है।
हालांकि चुनौतियां हैं – जैसे कि लागत और कैपेसिटी – लेकिन एलन मस्क की यह परियोजना भारत के करोड़ों लोगों को पहली बार तेज और भरोसेमंद इंटरनेट से जोड़ सकती है।





