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अगर महिलाएं राफेल उड़ा सकती हैं, तो सेना में कानूनी पदों पर उनकी संख्या इतनी कम क्यों?” – सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से किया सवाल

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BY: Yoganand shrivastva

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम सवाल उठाकर देशभर में सेना में लैंगिक समानता पर नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि अगर महिलाएं भारतीय वायुसेना में राफेल जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स उड़ा सकती हैं, तो भारतीय सेना की जज एडवोकेट जनरल (JAG) शाखा में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता?

यह सवाल तब उठा जब दो महिला अधिकारियों, अर्शनूर कौर और आस्था त्यागी, ने जेएजी शाखा में चयन में लैंगिक भेदभाव को लेकर याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘लिंग तटस्थता का मतलब 50:50 नहीं, बराबरी का अधिकार’

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन शामिल थे, ने याचिका पर सुनवाई के दौरान कई तीखे सवाल पूछे। कोर्ट का कहना था कि:

  • लिंग तटस्थता का मतलब सिर्फ 50:50 का अनुपात नहीं, बल्कि योग्यता आधारित चयन है।
  • यदि 10 महिलाएं योग्यता के आधार पर चुनी जाती हैं, तो सभी को अवसर मिलना चाहिए, न कि सिर्फ 3 सीटों तक सीमित रखा जाए।

याचिका का सार: मेरिट लिस्ट में आगे, फिर भी चयन नहीं

  • अर्शनूर कौर और आस्था त्यागी ने JAG शाखा में चयन के लिए परीक्षा दी थी।
  • मेरिट में वे क्रमश: 4वें और 5वें स्थान पर थीं।
  • फिर भी उन्हें चयनित नहीं किया गया क्योंकि महिलाओं के लिए केवल 3 सीटें आरक्षित थीं (कुल 6 में से)।

कोर्ट की प्रतिक्रिया:

“अगर एक महिला राफेल फाइटर जेट उड़ाकर दुश्मन का सामना कर सकती है, तो सेना की कानूनी शाखा में उसे शामिल करने में क्या दिक्कत है?” – जस्टिस दीपांकर दत्ता

सेना और केंद्र का पक्ष: क्यों सीमित हैं महिलाओं के लिए पद?

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सेना की तरफ से जवाब देते हुए कहा:

  • JAG शाखा केवल “शांति काल में कानूनी सलाहकार” नहीं है, यह सेना की परिचालन क्षमता का भी हिस्सा है
  • 2012 से 2023 तक महिला भर्ती नीति 70:30 थी, जिसे 2024 से 50:50 किया गया है।
  • महिला और पुरुष अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया अलग-अलग है क्योंकि SSB जैसे टेस्ट में “गहन शारीरिक संपर्क” शामिल होता है।

भाटी ने कहा कि यह एक सावधानीपूर्ण निर्णय है कि महिलाओं को अग्रिम युद्ध क्षेत्र में तैनात नहीं किया जाता, ताकि उन्हें युद्धबंदी बनाए जाने के जोखिम से बचाया जा सके।

कोर्ट की चिंता: “लिंग तटस्थता सिर्फ नारा नहीं, नीति में दिखनी चाहिए”

  • कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि जब पदों को लिंग-तटस्थ बताया जाता है, तो फिर चयन में लिंग के आधार पर अलग सीटें क्यों?
  • जस्टिस मनमोहन ने कहा: “अगर महिला अधिकारी मेरिट में हैं, तो उनका लिंग क्यों आड़े आए?”

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